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Wednesday, 18 August 2021

मुक्तक

प्रार्थना में बन्धन कहाँ? 
प्रेम में अनुबन्ध कैसा? 
अर्चना में प्रतिबन्ध कैसा? 
आराधना आत्मा की पुकार है 
आस्था जीवन का आधार है
सुमिरन प्रभु नाम की गुंजार है

नव प्रभात यह विहगों का, रव ले कर आया है
नव पल्लव, नव कुसुम, नवल दल, सर नीरज मुस्काया है
रजनी ने नीली चूनर में, तारक थाल सजाया है
नेहसिक्त इस पुण्य धरा ने कण कण यूँ महकाया है

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन