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Monday, 16 January 2017

तेरी यांदों के गर्म लिहाफ

सुनसान सर्द रातें
जब मेरे दिल को
बर्फ सा जमाने लगती है
तेरी यांदों के गर्म लिहाफ
खुद पर ढाँप लेता हूँ
ठिठुरते भाव जब मेरे
न हिम-खण्ड हो जाए
सुरीले गीत तेरे 
मैं खुद ही
गुनागुना लेता हूँ

तुम हो कही और मैं कहीं 
इस की न है परवाह
ढली है रात जब भी
गगन की घुप्प स्याही में
सितारे लाख होते हैं
उभरते हो उन्हीं में से
तुम्हें चुन करके
मन की पीर
मैं खुद ही
सुना लेता हूँ

तकिया सिरहाने

yह तकिया सिरहाने का
जो पी चुका है
अनगिनत खारे आँसू
गवाह है मेरे उन
जागते हुए देखे सपनों का
सोते हुए देखे सपनों का
छत को अपलक निहारती
पथराई आँखों का
याद है रुपान्तरित
तकिया बनी बाहों का

धुले हुए काजल को
खुद में सहेजे
थपकी देती हूँ इसे
तुमको सहलाने की
छुअन देती हूँ
संवेदी संप्रेषण के एहसास की
इसके कानों में
कह जाती कुछ
जैसे सुन लोग अभी तुम
कहता है विश्वास से
बाहें वे लौटेंगी जब
मैं नहीं चला जाऊँगा

दिल में लगी सेंध













दिल में
कैसे और कब लग गई सेंध
पता ही नही चला
कुछ चुराने के बजाए
इसे पूरा का पूरा भर गया
पता ही नहीं चला

महकता है ये रात दिन
छिड़क गया पराग कोने-कोने
पता ही नहीं चला
चुरा ले गया मुझे मुझसे ही 
भर दी प्रेम की अकूत दौलत
पता ही नहीं चला।

जब तब आता है दबे पाँव
गुदगुदाता है अन्तस को
चुभा चुभा कर तर्जनी
दिल की कचहरी में 
जालियों की ओट से
बैठ कर रोज झाँकता है वही
पता ही नहीं चला

यथार्थ को भीतर बाहर से जी लें


जिन्दगी के हर लम्हे में 
यथार्थ ही यथार्थ है
क्यों असत्य की बदनुमा चादर से
यथार्थ को ढाँपते हो
यथार्थ को अन्तर में स्वीकारते 
पर बाहर से नकारते हो
अन्तर में तुम जीतते हो
फिर बाहर से क्यों हारते हो
यथार्थ तो फिर यथार्थ है 
आओ यथार्थ को
भीतर बाहर से बराबर जी लें हम

जो घट रहा वही यथार्थ है
शेख चिल्ली का घड़ा यथार्थ है
स्वप्न और नेपथ्य निरा असत्य है
जगत में, जीवन के रंगमंच में
सब का सब यथार्थ ही यथार्थ है
यथार्थ वर्तमान है
यथार्थ है यही धरा, यही आसमान है
क्यों खोजते भविष्य को
खड़ा है सामने प्रकट
यथार्थ विद्यमान है

आओ यथार्थ की भूमि पर
साहस के बीज बोलें हम।
कर्म के पैने औजार पर
पड़ी जंग धोलें हम।।
छूटे न पाँव कभी धरती से
अम्बर पर बैठी मंजिल को
अपने इन हाथों से छूलें हम।।
खारा है सारा समुन्दर
गर्भ से निकले अमृत की
कुछ बूँद तो पी लें हम
आओ यथार्थ को
भीतर बाहर से बराबर जी लें हम

क्या अकेली हूँ मैं?










क्या अकेली हूँ मैं?

बैठती हूँ जैसे ही चुपचाप
पाती हूँ घिरी हुआ स्वयं
उस भरी भीड़ में, शोर में,
अलग-थलग होती हूँ 
सब हैं उहापोह में, आपाधापी में
मन भागता है बेशुमार
ताँगे में जुते अश्व की तरह
गाँव में, शहर में, डगर में
आदमियों के जंगल में
संवेदनाओं की कब्रगाह में

यह कैसा अकेला पन
जहाँ सन्नाटे चीखते हैं
मौन मरघट में खड़ा है
दौड़ रहा है हर कोई
मैं अकेला होकर भी 
अकेलापन कहाँ होता है
मैं स्तब्ध हूँ, देखता ही हूँ
पर मन बड़ा अजीब है
वह अकेला भीड़ संग दौड़ता है
और भीड़ में अकेला दौड़ता है 
बस दौड़ता ही दौड़ता है

जिन्दगी का कैनवास

मेरे खाली कैनवास पर तो 
तुम्हारी परछाई छाई रहती है सदा 
उकेरने जब जब लगता हूँ जैसे ही
नयन की नमी उसे धुँधियाती है

कूँचियाँ उठाता हूँ मैं रेशमी रंगों भरी
बिखरने लगती है इन्द्रधनुषी छटा 
समाहित हो जाती है पल पल की धडकनें
कैनवास पर खुद ही उभर आते हैं नूतन चित्र

दीवार पर टँगे इस कैनवास पर
तुम मेरी प्रतिनिधि रचना हो जीवन की
लोग इसे देखते हैं जब कभी तो
प्रयास करते हैं बाँचने का अमूर्त कृति को

नहीं उतार पाया अब तक जीवन में तुझे
सब कुछ है वैसा का वैसा ही 
लगता है अब कैनवास की जमीन
एहसास का अक्स उतर आया है 

चाँद अंतस में उतर आया है

चाँद से निकल कर एक चाँद
मेरे अंतस में उतर आया है।

पता तब चला
जब नूर उसका
इस जिन्दगी में 
उजास भर लाया
जानते हो तुम क्या?
क्यों निगाह मेरी झुकी झुकी है
क्या वहाँ ढूँढती है?
चाँद से निकल कर एक चाँद
मेरे अंतस में उतर आया है

जब कोई  दर्द का साया
लिपटता है दामन से
घेरती है तनहाइयाँ
घिरती है मायूसी
कतरे उस चाँद की रोशनी के
देखता हूँ दिल में मैं
रोशनी उन्हें खदेड़ देती है
चाँद से निकल कर एक चाँद
मेरे अंतस में उतर आया है

बेफिक्र हूँ मैं
रोशनी ड्योडी पर
जागती ही रहती है 
पहरुआ मेरी बन गई
रोशनी की शक्ल में
जिन्दगी को  मिल गया चाँद
पर मुझे रोशनी मिल गई
चाँद से निकल कर एक चाँद
मेरे अंतस में उतर आया है।



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