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Monday, 16 January 2017

चाँद अंतस में उतर आया है

चाँद से निकल कर एक चाँद
मेरे अंतस में उतर आया है।

पता तब चला
जब नूर उसका
इस जिन्दगी में 
उजास भर लाया
जानते हो तुम क्या?
क्यों निगाह मेरी झुकी झुकी है
क्या वहाँ ढूँढती है?
चाँद से निकल कर एक चाँद
मेरे अंतस में उतर आया है

जब कोई  दर्द का साया
लिपटता है दामन से
घेरती है तनहाइयाँ
घिरती है मायूसी
कतरे उस चाँद की रोशनी के
देखता हूँ दिल में मैं
रोशनी उन्हें खदेड़ देती है
चाँद से निकल कर एक चाँद
मेरे अंतस में उतर आया है

बेफिक्र हूँ मैं
रोशनी ड्योडी पर
जागती ही रहती है 
पहरुआ मेरी बन गई
रोशनी की शक्ल में
जिन्दगी को  मिल गया चाँद
पर मुझे रोशनी मिल गई
चाँद से निकल कर एक चाँद
मेरे अंतस में उतर आया है।



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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन