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Monday, 16 January 2017

तकिया सिरहाने

yह तकिया सिरहाने का
जो पी चुका है
अनगिनत खारे आँसू
गवाह है मेरे उन
जागते हुए देखे सपनों का
सोते हुए देखे सपनों का
छत को अपलक निहारती
पथराई आँखों का
याद है रुपान्तरित
तकिया बनी बाहों का

धुले हुए काजल को
खुद में सहेजे
थपकी देती हूँ इसे
तुमको सहलाने की
छुअन देती हूँ
संवेदी संप्रेषण के एहसास की
इसके कानों में
कह जाती कुछ
जैसे सुन लोग अभी तुम
कहता है विश्वास से
बाहें वे लौटेंगी जब
मैं नहीं चला जाऊँगा

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन