तुम्हारी परछाई छाई रहती है सदा
उकेरने जब जब लगता हूँ जैसे ही
नयन की नमी उसे धुँधियाती है
कूँचियाँ उठाता हूँ मैं रेशमी रंगों भरी
बिखरने लगती है इन्द्रधनुषी छटा
समाहित हो जाती है पल पल की धडकनें
कैनवास पर खुद ही उभर आते हैं नूतन चित्र
दीवार पर टँगे इस कैनवास पर
तुम मेरी प्रतिनिधि रचना हो जीवन की
लोग इसे देखते हैं जब कभी तो
प्रयास करते हैं बाँचने का अमूर्त कृति को
नहीं उतार पाया अब तक जीवन में तुझे
सब कुछ है वैसा का वैसा ही
लगता है अब कैनवास की जमीन
एहसास का अक्स उतर आया है

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