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Monday, 16 January 2017

जिन्दगी का कैनवास

मेरे खाली कैनवास पर तो 
तुम्हारी परछाई छाई रहती है सदा 
उकेरने जब जब लगता हूँ जैसे ही
नयन की नमी उसे धुँधियाती है

कूँचियाँ उठाता हूँ मैं रेशमी रंगों भरी
बिखरने लगती है इन्द्रधनुषी छटा 
समाहित हो जाती है पल पल की धडकनें
कैनवास पर खुद ही उभर आते हैं नूतन चित्र

दीवार पर टँगे इस कैनवास पर
तुम मेरी प्रतिनिधि रचना हो जीवन की
लोग इसे देखते हैं जब कभी तो
प्रयास करते हैं बाँचने का अमूर्त कृति को

नहीं उतार पाया अब तक जीवन में तुझे
सब कुछ है वैसा का वैसा ही 
लगता है अब कैनवास की जमीन
एहसास का अक्स उतर आया है 

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन