दिल में
कैसे और कब लग गई सेंध
पता ही नही चला
कुछ चुराने के बजाए
इसे पूरा का पूरा भर गया
पता ही नहीं चला
महकता है ये रात दिन
छिड़क गया पराग कोने-कोने
पता ही नहीं चला
चुरा ले गया मुझे मुझसे ही
भर दी प्रेम की अकूत दौलत
पता ही नहीं चला।
जब तब आता है दबे पाँव
गुदगुदाता है अन्तस को
चुभा चुभा कर तर्जनी
दिल की कचहरी में
जालियों की ओट से
बैठ कर रोज झाँकता है वही
पता ही नहीं चला


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