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Monday, 16 January 2017

क्या अकेली हूँ मैं?










क्या अकेली हूँ मैं?

बैठती हूँ जैसे ही चुपचाप
पाती हूँ घिरी हुआ स्वयं
उस भरी भीड़ में, शोर में,
अलग-थलग होती हूँ 
सब हैं उहापोह में, आपाधापी में
मन भागता है बेशुमार
ताँगे में जुते अश्व की तरह
गाँव में, शहर में, डगर में
आदमियों के जंगल में
संवेदनाओं की कब्रगाह में

यह कैसा अकेला पन
जहाँ सन्नाटे चीखते हैं
मौन मरघट में खड़ा है
दौड़ रहा है हर कोई
मैं अकेला होकर भी 
अकेलापन कहाँ होता है
मैं स्तब्ध हूँ, देखता ही हूँ
पर मन बड़ा अजीब है
वह अकेला भीड़ संग दौड़ता है
और भीड़ में अकेला दौड़ता है 
बस दौड़ता ही दौड़ता है

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन