जिन्दगी के हर लम्हे में
यथार्थ ही यथार्थ है
क्यों असत्य की बदनुमा चादर से
यथार्थ को ढाँपते हो
यथार्थ को अन्तर में स्वीकारते
पर बाहर से नकारते हो
अन्तर में तुम जीतते हो
फिर बाहर से क्यों हारते हो
यथार्थ तो फिर यथार्थ है
आओ यथार्थ को
भीतर बाहर से बराबर जी लें हम
जो घट रहा वही यथार्थ है
शेख चिल्ली का घड़ा यथार्थ है
स्वप्न और नेपथ्य निरा असत्य है
जगत में, जीवन के रंगमंच में
सब का सब यथार्थ ही यथार्थ है
यथार्थ वर्तमान है
यथार्थ है यही धरा, यही आसमान है
क्यों खोजते भविष्य को
खड़ा है सामने प्रकट
यथार्थ विद्यमान है
आओ यथार्थ की भूमि पर
साहस के बीज बोलें हम।
कर्म के पैने औजार पर
पड़ी जंग धोलें हम।।
छूटे न पाँव कभी धरती से
अम्बर पर बैठी मंजिल को
अपने इन हाथों से छूलें हम।।
खारा है सारा समुन्दर
गर्भ से निकले अमृत की
कुछ बूँद तो पी लें हम
आओ यथार्थ को
भीतर बाहर से बराबर जी लें हम

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