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Thursday, 10 May 2018

मुक्तक

स्वयं के वास्ते एक पल कभी भी जी नही पाया ।
सरल पीता रहा हरदम गरल में पी नही पाया ।
निशानी वक्ष पर मेरे सदा देते रहे तुम सब
तुम्हारे घाव के उपहार को मै सह नही पाया ।

कभी होगी रजत सी चाँदनी नभ में
कभी होगी निविड़ तम से भरी रातें
मैं बन कर दीप अपनी रोशनी लेकर
खड़ा हूँ राह में तेरी सहूँगा सब तेरी बातें

रोशनी की बारात

आज पुरवा दस दिशाओं से चली है
आज मेंहदी ही स्वयं दिल में घुली है
इस तमस में रोशनी बारात बन कर
चमचमा दी इस नगर की हर गली है।
       
साधना की सिद्धि में तप ली अपर्णा
शंभु के आशीष पाने का समय है
घुल गई तम की सुनामी लालिमा में
नीरजा उठ प्राच्य में रवि का उदय है।।

कुन्द सी थी इस शिरा में प्रीत पिघली
बज उठी शहनाइयाँ मन की गली
बोल दो प्रतिहारियों को हों सजग
आज डोली जाएगी प्रीतम - नगर।
       

जमीन आसमान


जानते हो?
बादल हजारों मील चल कर
जाते हैं परबत पर
अपने आप को उस पर गलाने को
खो देते हैं नाम भी अपना
सिर्फ इसलिए कि
पर्वत जल से भर जावे
पर अपनी गर्विता में पर्वत
बादलों के तप को
अक्सर बहा दिया करता है
स्वागतों में उस बिखरते नीर को
धन्य है वे जो बिछे हैं इस जमीं पर
पोखर, झील, और सरवर बन कर
देखता है जब कोई चढ़ कर शिखर पर
चींटियों से लग रहे थे सब जमीं के आदमी
एक खिलौना लग रही थी वह लिबर्टी
जेट में उड़ते हुए इक गुरूरे-सक्ष को
छू रही आकाश की सरहद पतंगे
भूल कर के तार को और सरजमीं को
कौन जाने बहक जाए हवा की नीयतें
तार टूटे फिर नसीबा उसका जमी है
पाँव की मिट्टी अभी उन कंधरो पर
शेष है जिन से चढ़े थे शूरमा सब

Tuesday, 8 May 2018

अहं ब्रह्मास्मि

मैं, अकसर बेखबर सा
खुद को देखता हूँ अचरज से
मैं मुझसे ही बहुत दूर निकल आया हूँ

न मुड़ कर कभी देखा
न रुक कर कभी सोचा
न अपनी पहिचान रही बाकी
क्योंकि मैं तो मुझसे ही
बहुत दूर निकल आया हूँ
है कोई जो मुझे मुझ से मिला दे?


है छिपा कोई रश्मि पुँज मुझमें ही
फूँक कर अज्ञान के कोहरे को
परमज्योति का जो दर्शन करा दे
दूर बज रही है प्रणव की भेरियाँ
कानों पर लगे हैं माया के ढँकने
आकर कोई अब तो हटा दे
मैं मुझसे ही बहुत दूर निकल आया हूँ

है कोई जो मुझे मुझ से मिला दे?
मैं खड़ा था कुण्ठित सा
दुनिया के  मायावी रंगमंच पर
एक छाया सी उतरी
छुआ उसने रेशमी उँगलियों से

यहाँ से केवल तीन छ्लाँग दूर पर
तुरीय का सत्य बोध है
वैश्वानर से तैजस, तैजस से प्राज्ञ
और प्राज्ञ से ओंकार
पहली छलाँग स्वप्न में
दूसरी सुषुप्ति में और तीसरी
तीसरी उस विराट में, परमचेतना में

यह रूप की नहीं अरूप की यात्रा है
यात्रा है अपनी उपाधियों के विसर्जन की
यात्रा है स्वयं में लौटने की
अभी नहीं होगी तो कभी नहीं होगी
यह प्रयाण नहीं आरोहण है
क्योकि मैं तो सिर्फ "मैं" हूँ....
"अहं ब्रह्मास्मि"

Monday, 7 May 2018

सपने है ही नहीं

जहाँ सपने है ही नहीं
न जागते न कभी सोते में
जो भरभरा के टूट जाए
न सीसे हैं, न पत्थर
जो टूट कर बिखर जाए
भूख पेट को खा रही
खाने को फिर किधर जाए

झुग्गिर्यों की छतों से
न छुप सका आसमान
सर छुपाने फिर कहाँ जाए

न मंजिल का पता न राह का ही
पैरों को कैसे पता हो कहाँ जाए
पैबन्दों से ढके लिबास से
अकसर झाँकता है तन बदन
रेंगती रहती हैं कुत्सित निगाहें तन पर उनके

प्रार्थना

प्रार्थना समर्पण है माँग नही
जहाँ माँग है वहाँ खोखला पन है
"चाहना" तो कामना का रूपान्तरण है
कामना भीतर और बाहर का द्वन्द्व है

प्रार्थना मन की मौन अभिव्यक्ति है
प्रार्थना शरीर का नहीं "मैं" का विसर्जन है
केवल शब्दों का समूह भी प्रार्थना नहीं है

शब्दों पर पवित्र भावों का आरोहण है
केवल जिह्वा का नहीं हृदय का उच्चारण है
प्रार्थना अनुनय का पर्याय नहीं है

Wednesday, 2 May 2018

पाना शेश रह गया

हमने वो खोया है जो
कभी पा ही नहीं सके
तुम खो न देना उसे जो
सिर्फ तुम्हारा ही है।

चाँद आसमान की दौलत है
पाने की हम जिद ही करते रहे।
आबाद होगा कभी घरौंदा अपना
जिन्दगी भर से तिनके पिरोते रहे।।

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन