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Monday, 7 May 2018

सपने है ही नहीं

जहाँ सपने है ही नहीं
न जागते न कभी सोते में
जो भरभरा के टूट जाए
न सीसे हैं, न पत्थर
जो टूट कर बिखर जाए
भूख पेट को खा रही
खाने को फिर किधर जाए

झुग्गिर्यों की छतों से
न छुप सका आसमान
सर छुपाने फिर कहाँ जाए

न मंजिल का पता न राह का ही
पैरों को कैसे पता हो कहाँ जाए
पैबन्दों से ढके लिबास से
अकसर झाँकता है तन बदन
रेंगती रहती हैं कुत्सित निगाहें तन पर उनके

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन