जहाँ सपने है ही नहीं
न जागते न कभी सोते में
जो भरभरा के टूट जाए
न जागते न कभी सोते में
जो भरभरा के टूट जाए
न सीसे हैं, न पत्थर
जो टूट कर बिखर जाए
भूख पेट को खा रही
खाने को फिर किधर जाए
जो टूट कर बिखर जाए
भूख पेट को खा रही
खाने को फिर किधर जाए
झुग्गिर्यों की छतों से
न छुप सका आसमान
सर छुपाने फिर कहाँ जाए
न छुप सका आसमान
सर छुपाने फिर कहाँ जाए
न मंजिल का पता न राह का ही
पैरों को कैसे पता हो कहाँ जाए
पैरों को कैसे पता हो कहाँ जाए
पैबन्दों से ढके लिबास से
अकसर झाँकता है तन बदन
रेंगती रहती हैं कुत्सित निगाहें तन पर उनके
अकसर झाँकता है तन बदन
रेंगती रहती हैं कुत्सित निगाहें तन पर उनके

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