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Tuesday, 8 May 2018

अहं ब्रह्मास्मि

मैं, अकसर बेखबर सा
खुद को देखता हूँ अचरज से
मैं मुझसे ही बहुत दूर निकल आया हूँ

न मुड़ कर कभी देखा
न रुक कर कभी सोचा
न अपनी पहिचान रही बाकी
क्योंकि मैं तो मुझसे ही
बहुत दूर निकल आया हूँ
है कोई जो मुझे मुझ से मिला दे?


है छिपा कोई रश्मि पुँज मुझमें ही
फूँक कर अज्ञान के कोहरे को
परमज्योति का जो दर्शन करा दे
दूर बज रही है प्रणव की भेरियाँ
कानों पर लगे हैं माया के ढँकने
आकर कोई अब तो हटा दे
मैं मुझसे ही बहुत दूर निकल आया हूँ

है कोई जो मुझे मुझ से मिला दे?
मैं खड़ा था कुण्ठित सा
दुनिया के  मायावी रंगमंच पर
एक छाया सी उतरी
छुआ उसने रेशमी उँगलियों से

यहाँ से केवल तीन छ्लाँग दूर पर
तुरीय का सत्य बोध है
वैश्वानर से तैजस, तैजस से प्राज्ञ
और प्राज्ञ से ओंकार
पहली छलाँग स्वप्न में
दूसरी सुषुप्ति में और तीसरी
तीसरी उस विराट में, परमचेतना में

यह रूप की नहीं अरूप की यात्रा है
यात्रा है अपनी उपाधियों के विसर्जन की
यात्रा है स्वयं में लौटने की
अभी नहीं होगी तो कभी नहीं होगी
यह प्रयाण नहीं आरोहण है
क्योकि मैं तो सिर्फ "मैं" हूँ....
"अहं ब्रह्मास्मि"

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