सब चुप थे..
दुआओं के उठे वे हाथ
..कुछ जाने पहचाने
..कुछ अपने कुछ बेगाने
पता नहीं कहाँ कहाँ से
कब कब आये
पीड़ा, कम्प, भय को
चले गए चुपचाप
मुझ से दूर धकेल कर
और मैं,
हाँ! मैं!!
जैसे धूल झाड़ कर
फिर खड़ा हो गया हूँ
सब चुप थे..
दुआओं के उठे वे हाथ
..कुछ जाने पहचाने
..कुछ अपने कुछ बेगाने
पता नहीं कहाँ कहाँ से
कब कब आये
पीड़ा, कम्प, भय को
चले गए चुपचाप
मुझ से दूर धकेल कर
और मैं,
हाँ! मैं!!
जैसे धूल झाड़ कर
फिर खड़ा हो गया हूँ
अपनी पीड़ा तुम में जब जब पाता हूँ
मन ही मन मैं और दुःखी हो जाता हूँ
इसीलिये अपने दुखते हुए व्रणों को
चुपचुप अपने में छुपकर सह जाता हूँ
मुस्कानों से ढँका छिपा यह दर्द मेरा
इन सांसों की राह कहीं ना खुल जाए
तेरी मन की इस फुलबगिया में जा
इसी वजह कोई तुषार ना पड़ जाए
मेरे खुले हृदय की हर इक धमनी में
पिघला सीसा संग रुधिर के घूम रहा
उठती गिरती इस जीवन की धारा में
महाकाल हर पल मेरा माथा चूम रहा
तुम नदी हो
एक बहती नदी
रुकोगी नही,
वापस मुड़ोगी भी नही
मैं खड़ा रहा
बाहें फैलाये
समुन्दर बन कर
कि तुम पहुँचोगी
जरूर एक दिन
मुझ तक
करुणा की मेरी झोली में
केवल बासी दर्द भरे हैं
यह कैसा ही बौनापन है
हम हँसने में भी डरे हैं
अनजाने लोगों ने आकर
खुले व्रणों पर नमक धरे हैं
रात गई और प्रात हुई पर
नयन अभी भी नीर भरे हैं
ढली शाम और थके पाँव
विषदंशों के स्राव हरे हैं
हम निर्मम की इस बस्ती में
कितने बेबस आज घिरे हैं
आज इलाजों की मण्डी में
शातिर नश्तर बाज भरे है
कोई जिये मरे कोई भी
सौ सौ पाकिटमार भरे हैं
देखता हूँ जब कभी
चहकते ठुमकते बच्चे को
उन्मुक्त खेलते हुए
जी करता है जी भर कर
वह बच्चा तुम हो जाओ
और मैं हो जाऊं
तुम्हारे हाथों की गुड़िया
सोचता हूँ कभी कभी
छिदी बिंधी बासुरी
बन कर के मैं
अधरों से लग जाऊँ
थोथापन यह है मेरा
एक फूँक से तुम्हारी
मैं रागों से भर जाऊँ