*

*
*

Tuesday, 29 October 2019

मैं वही मिट्टी हूँ

मिट्टी ने सुगबुगाया
गली मैं, तपी मैं
पर जब बना कुछ
तो नाम मेरा बदल गया
मिट्टी से हो गई हूँ "दिया"

बाहर फिर एक तपन है
बाती में फिर एक अगन है
पर अब मुझसे एक उजास है
तिमिर से तुमूल की प्यास है

गुमसुम ये राहें रोशन हुई
दिशाएँ फैल गई सब ओर
तपन में ढूँढ लिया है
मैने चिर सुख
बाँटते रहने का सुख

मैं वही अमर मिट्टी हूँ
चाहे मैं, दिया हूँ तुम्हारे लिये
मैं फिर भी वही मिट्टी हूँ

रामनारायण सोनी
(२९.१०.१९)

Sunday, 27 October 2019

तमस दीप पर भारी है

है बौने दीप का साहस अँधेरी रात डरती है
भले हो कालिमा भारी अमावस भी सिहरती है।

अँधेरी आस्थाओं में भरम के तन्तु गलते हैं
प्रकट हो रोशनी के क्षण सभी दुःस्वप्न जलते हैं।

किरण का प्रस्फुटन ही विजय की नीव रखता है
तमस पर जीत की लिखी कहानी साथ रखता है

धरा की ओढ़नी में ये सितारे दीप के टाँके
सुहागन रात मस्ती में अहा! मधुकुञ्ज से झाँके

रंगोली मेरे आँगन की ये है प्रीत का परिमल
बताशे खील और धानी सजा इस साँझ का आँचल।

Tuesday, 10 September 2019

जीवंत जीवन

जो लहराते नहीं
  वे झंडे नहीं हैं
जो उगते नहीं
वे बीज नहीं है
जो पसीजे नहीं
  वे मानव नहीं है
जिनमें उमंग नहीं
  वे जीते नहीं है

लकीरों का अग्नि पथ

वक्त चलता ही रहा
हर्फ लिक्खे रह गए
घिसटते हुए साँप की
छूटी उन लकीरों जैसे

कभी चमकती है
लकीरें अग्नि पथ सी
कभी धुँधियाती है
बुझी यादों के धुऐं सी

लकीरें हाथों की
सिलवटें माथों की
गुजरते वक्त की
सियाही रातों की
वक्त चलता ही रहा
हर्फ लिक्खे रह गए

आत्मा तो वही है

पंख बदलने से
आकाश नही बदलता
  सूरज भी तो वही है
जहाज बदलने से
सागर नहीं बदलता
  जल भी तो वही है
सूरत बदलने से
सीरत नही बदलती
  आदमी तो वही है
शरीर बदलने से
चोला बदलता है
  आत्मा तो वही है

ये थके रिश्ते

छन्दों का विन्यास छूटा
छद्मों का जाल टूटा
कविता कुछ फुसफुसाई
दामन में है जुन्हाई

चलो चौपाल पर
बैठे है थके रिश्ते
कुछ बाएँ कुछ दाएँ
अनमने निढाल से
आओ गले लग जाएँ

सुनो!
मुर्गे ने बाँग दी है
डूबा सूरज
फिर ढूँढ लाएँ

तुम्ही आत्मा हो

मैं बैठा था
आँख वाला अंधा
  घिरा सब ओर तमस था
कोई आया अचानक
  नहीं वह कोई नही..
   ...अरे! वह तुम ही तो थे
दिया जला दिया तुमने
  दिखा प्रकाश, दिखा अंधकार भी
   और तब जाना
    तुम भी तो यहीं हो
     तुम्ही ज्ञान हो, तुम्ही प्रकाश हो
       तुम्ही आत्मा हो,
       तुम्ही आत्मा हो

           रामनारायण सोनी

About Me

My photo
खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन