भाव निर्झर, रूह की राहत, प्रेम और समर्पण
छन्दों का विन्यास छूटा छद्मों का जाल टूटा कविता कुछ फुसफुसाई दामन में है जुन्हाई
चलो चौपाल पर बैठे है थके रिश्ते कुछ बाएँ कुछ दाएँ अनमने निढाल से आओ गले लग जाएँ
सुनो! मुर्गे ने बाँग दी है डूबा सूरज फिर ढूँढ लाएँ
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