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Saturday, 2 January 2021

ले चलो ऐसे ही


यकीं आज भी नहीं होता
 हम कहाँ थे?
   और, अब!!......
ये कहाँ आ गये हम?
 बस चले थे कुछ क़दम ही ...
  और फिर
     न जाने क्यों? कैसे?     
       चलते जा रहे हैं
 ना! ना!! कोई अदृश्य 
  उँगली थामे लिये जा रहा
    हमें पगडंडियों से 
      इन्द्रप्रस्थ में
 अरे! यह तो तुम हो
     ले चलते रहना, ऐसे ही....

      रामनारायण सोनी

Friday, 1 January 2021

दो क्षुद्रिकाएँ

मैं अभी व्यस्त हूँ
तुमको, उसको,
किसी और को खोजने में
इस भय से कि
कहीं मुझे मैं न मिल जाऊँ
यहाँ प्रश्न अनेक मुझ में
धधक रहे है

रामनारायण सोनी
25.01.20

क्या तुम्हारी
मेरी,
हमारी प्रार्थनाएँ
अब कोई नहीं सुनता ?

देखो!
इन उजालदानों से
अँधेरे ही क्यों झाँकते हैं

रामनारायण सोनी
25.01.20



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सरसराता संगीत

नहीं जानता
इतिहास और उत्पत्ति,
प्रजातियाँ और प्रकल्प
इन फरफराती चिड़ियों का
मुझे बस पसन्द हैं
पंख इनके
नापती है आकाश जिससे
खेलती है हवाओं से
फराफरा कर आ बैठती है
आँगन के चौंतरे पर
टेढ़ी गर्दन कर देखती है
जब एक आँख से
और मैं लालित्य से भर जाता हूँ
छोड़ जाती है कानों में
फड़फड़ाते पंखों का
सरसराता संगीत जिसे
सूने में भी अकसर सुनता रहता हूँ

रामनारायण सोनी
१७.०८.२०

तिल तिल कर रीत गए


जीवन की मोटी पोथी पर
कितने ही कवर बदल गए
हर्फों, लफ़्जों, अहसासों में
मेरी-उसकी कुछ बातों में
बीती घड़ियों में साँसों में
मुट्ठी भर ख्वाब खयालों में
जो लिख्खे वक्त की स्याही ने
वे तिल तिल कर रीत गए

उस वक्त का अब क्या करूँ
तुम बिन जो फक्त हाे गया
फैली मेरी जो बाहें तो मैं
इनमें ख़ुद ही जब्त हो गया।
चाँद सितारे सब मिल कर
ना कर पाये इसको रोशन 
इक बुझता चिराग भी अब
थक हार के बेसिम्त हो गया।।

रामनारायण सोनी

फिर आज की सुबह हुई


अभी अभी अम्बर पर
फैली है अरुणाई
चटखे हैं कुछ डेंडुए कपास के
ले कर कर्म के बीज 
और तुम्हारे प्रेम के झक्क रेशे
चरखा मेरा फिर चलेगा
कातूँगा मलमली धागा
भर कर वक्त के करघे में
श्रम के ताने, विधि के बाने
फिर बुनूँगा अधबुनी चादर को
जीवन की 

रामनारायण सोनी



नैना गुँथ गये

नैना गुँथ गये

कौन मैं और कौन तुम हो
दो पखेरू डाल पर ऐसे मिले
नैना गुँथ गये।।

लिपट लिपट तमाल से
वल्लरी का रोम हर्षण
चन्द्रिका पहने कलाएँ
सज रही सारी दिशाएँ।

दो हृदय गल हार हो ऐसे मिले
नैना गुँथ गए।।

ओढ़ नीलम तारकों को
सिक्त मन रजनी हुई है
बादलों की ओट ही से
चुलबुले चंचल नयन से

दो प्रणय के पुष्प ये ऐसे खिले
नैना गुँथ गए।।

रामनारायण सोनी
३०/०१/२०

तुम कहाँ, मैं कहाँ


मैं गिरि का पाहन हूँ 
 तुझ में है मलय गंध
  मैं बिखरी रज कण 
   तू छंदों का मधुर बंध।।

क्रन्दन के गाँव मेरे 
 तुम झिलमिल झीलों के
  टूटे सुर साज मेरे 
   तुम सप्तक शुभ वंशी के।।

मैं दर्पण हूँ कोरा सा पर 
 आते तुम जब जब
  अलबेली अठखेली सजती 
   वो छबि तब तब।।

    रामनारायण सोनी

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