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Friday, 1 January 2021

दो क्षुद्रिकाएँ

मैं अभी व्यस्त हूँ
तुमको, उसको,
किसी और को खोजने में
इस भय से कि
कहीं मुझे मैं न मिल जाऊँ
यहाँ प्रश्न अनेक मुझ में
धधक रहे है

रामनारायण सोनी
25.01.20

क्या तुम्हारी
मेरी,
हमारी प्रार्थनाएँ
अब कोई नहीं सुनता ?

देखो!
इन उजालदानों से
अँधेरे ही क्यों झाँकते हैं

रामनारायण सोनी
25.01.20



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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन