केवल तुम्हारे लिए
भाव निर्झर, रूह की राहत, प्रेम और समर्पण
*
*
Friday, 1 January 2021
फिर आज की सुबह हुई
अभी अभी अम्बर पर
फैली है अरुणाई
चटखे हैं कुछ डेंडुए कपास के
ले कर कर्म के बीज
और तुम्हारे प्रेम के झक्क रेशे
चरखा मेरा फिर चलेगा
कातूँगा मलमली धागा
भर कर वक्त के करघे में
श्रम के ताने, विधि के बाने
फिर बुनूँगा अधबुनी चादर को
जीवन की
रामनारायण सोनी
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ये हवाएँ बड़ी शरारती हैं
समय नही है
जीवन कितना जी पाता है
वहीं तो हूँ
तुम न थी, जब तुम न थी
शब्द में हैं अर्चनाएँ
पतझड़ फिर जीत गया
नेह धरा पर ऐसे उतरें
तन की तह के पार
अभी तक तुम नहीं आये
छोटी सी विराट कहानी
स्मित आनन की छबि ललाम
मौन क्या क्या कह रहा
राष्ट्र के प्रहरी बनो
सखे! लौटेगा मधुमास!
मन धरा पर
क्योंकि
तुम भी अवगाहन कर लो
ले चलो ऐसे ही
दो क्षुद्रिकाएँ
सरसराता संगीत
तिल तिल कर रीत गए
फिर आज की सुबह हुई
नैना गुँथ गये
तुम कहाँ, मैं कहाँ
*आदमी का शोर है*
२ कविताएँ
एक ही तो है
कोरोना से डरो ना
भाव लिखे थे
चुप की आवाजें
मौन क्या क्या कह रहा
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रामनारायण सोनी
खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन
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