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Friday, 1 January 2021

फिर आज की सुबह हुई


अभी अभी अम्बर पर
फैली है अरुणाई
चटखे हैं कुछ डेंडुए कपास के
ले कर कर्म के बीज 
और तुम्हारे प्रेम के झक्क रेशे
चरखा मेरा फिर चलेगा
कातूँगा मलमली धागा
भर कर वक्त के करघे में
श्रम के ताने, विधि के बाने
फिर बुनूँगा अधबुनी चादर को
जीवन की 

रामनारायण सोनी



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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन