जीवन की मोटी पोथी पर
कितने ही कवर बदल गए
हर्फों, लफ़्जों, अहसासों में
मेरी-उसकी कुछ बातों में
बीती घड़ियों में साँसों में
मुट्ठी भर ख्वाब खयालों में
जो लिख्खे वक्त की स्याही ने
वे तिल तिल कर रीत गए
उस वक्त का अब क्या करूँ
तुम बिन जो फक्त हाे गया
फैली मेरी जो बाहें तो मैं
इनमें ख़ुद ही जब्त हो गया।
चाँद सितारे सब मिल कर
ना कर पाये इसको रोशन
इक बुझता चिराग भी अब
थक हार के बेसिम्त हो गया।।
रामनारायण सोनी

No comments:
Post a Comment