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Saturday, 2 January 2021

ले चलो ऐसे ही


यकीं आज भी नहीं होता
 हम कहाँ थे?
   और, अब!!......
ये कहाँ आ गये हम?
 बस चले थे कुछ क़दम ही ...
  और फिर
     न जाने क्यों? कैसे?     
       चलते जा रहे हैं
 ना! ना!! कोई अदृश्य 
  उँगली थामे लिये जा रहा
    हमें पगडंडियों से 
      इन्द्रप्रस्थ में
 अरे! यह तो तुम हो
     ले चलते रहना, ऐसे ही....

      रामनारायण सोनी

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन