यकीं आज भी नहीं होता
हम कहाँ थे?
और, अब!!......
ये कहाँ आ गये हम?
बस चले थे कुछ क़दम ही ...
और फिर
न जाने क्यों? कैसे?
चलते जा रहे हैं
ना! ना!! कोई अदृश्य
उँगली थामे लिये जा रहा
हमें पगडंडियों से
इन्द्रप्रस्थ में
अरे! यह तो तुम हो
ले चलते रहना, ऐसे ही....
रामनारायण सोनी

No comments:
Post a Comment