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Thursday, 4 March 2021

यहीं तो हो तुम!

मन मीत मेरे!
आज अन्तस के
कुम्हलाए पुष्प फिर खिल उठे
जैसे तुम यहीं तो हो
मैंने तो बस सरगम का 
आलाप भर दिया था
पर तुमने कानों में उँडेल दिया
पूरा का पूरा राग विहाग
लगता है जैसे
यहीं तो हो
नही! नहीं!! यहीं हो तुम !!!

जब तुम न थी

तुम न थी, जब तुम न थी

तुम न थी तब रश्मियों में, उज्ज्वला का भास ना था।
रागिनी में स्वरलता का, कम्प ना था राग ना था।
स्वाँस में प्रश्वास में तो, बस पवन था प्राण ना था
तुम न थी तो उर्मियों में, प्रीत का मधुमास ना था।।
                    तुम न थी, जब तुम न थी

थे पुहुप बहु रंग के बहु गंध के बहु भाँति के वे
तुम न थी तो वे वियोगी, बाग के अधिभार से थे।
उन मुंडेरों की विधाएँ, थी अहा सुनसान कितनी
मधुपरी के वे अधर भी, रज बिना मधुभार से थे।।
                   तुम न थी, जब तुम न थी

चाँद की थी ज्योत्सना वह रोप्यमय आभास होती
थी प्रवालों में प्रखर आभा प्रवर प्रतिभास होती।
शून्य सी सम्वेदना थी, चहुँ दिशा अधिवास होती
पर हृदय की वीथियाँ तुम बिन कहाँ रनिवास होती।।
                   तुम न थी, जब तुम न थी

थे अधर शहदी, मधुप की गुंजनें मल्हार गाती
फरफराती तितलियाँ पुष्प को फिर फिर जगाती।
तुम न थी तो उन पलों की, कामना कैसे सुहाती
तुम न थी तो गीत कैसे, कोकिला ये छ्न्द गाती।।
                   तुम न थी, जब तुम न थी

तुम मिली अँकुवा गये नव, कोंपलों के गुल्म सारे
सन्दली होती हवाएँ, सब प्रमादी गीत हारे।
वल्लरी वन की लताएँ, झूलती साँझे-सकारे
मुग्ध मन के द्वार तुम बन, प्रीत के पाहुन पधारे।।
                   तुम न थी, जब तुम न थी

      रामनारायण सोनी
         ११.१२.२०

कविता की कहानी


जब कविता 
थी अपने शैशवकाल में,
नन्हे नन्हे डग चलीं थी
भावनाएँ अँकुआ रही थी
हल्के जर्द पड़े डायरी के पन्नों में 
सूखी वे गुलाब की पंखुडियों
मुस्कुराई, महमहाई...!
काल की कील पर टँगी
सुइयाँ पीछे दौड़ी, 
ठिठकी, कहीं ठहर गई
वहाँ, जहाँ लिखीं थी
ढाई आखर की
छोटी सी विराट कहानी...!

कोई तो भगीरथ है

कोई तो भगीरथ है
  जो उतार लाया 
   गंगा को स्वर्ग से
न तो मैं गंगा हूँ
  न ही भगीरथ
कौन है वो
  जो कर गया यह सब
   बस एक अहसास है मुझे
   बस एक अबोध सा बोध है
पर जो कुछ भी है
 कितना  सुन्दर है
  कृपा का वर्षण है
  तुम-हम बस भींगते रहें

छुप्पा-छुप्पी

छुप्पा-छुप्पी

आओ चलें
छुप्पा-छुप्पी खेलें
मैं अपनी आँखें
अपने हाथों से छुपा लेता हूँ
तुम मुझे पीछे से चपत लगा कर
फिर से कहीं छुप जाओ
चलो वह मासूम सा बचपन
फिर ढूँढ लाएँ
फिर बनें हम संगतराश
चिकनी गीली माटी के
गुड्डे गुड़िया बनाएँ
उन लम्हों में सुनहरे बर्क लगाएँ

दीप की लौ सा जलूँ

दीप की लौ सा जलूँ वह पथ तुम्हें जो दीख जाए
मेघ सा हो कर गलूँ मैं जब धरा पर बीज आए।
कैद सीपी में रहूँ मैं जब तलक मोती न निबजै
बीनता हूँ कटकों को राह तू जिस ओर जाए।।

🌹डबउबाये हैं नयन क्यों क्या कसक मन में धँसी
काँपते कर में विकलता क्यूँ फाँस मन में है फँसी।
मैं खड़ा हूँ सन्तरी बन तुम अभय के शल्क में हो
फेंक दो बीमार सोचें अब अधर पर हो हँसी।।

यादें कैसी कैसी

कुछ की आती नहीं

तो किसी की जाती नहीं
कुछ जा कर लौटती हैं फिर फिर
ले जाती है हमें वहाँ
तो कभी लाती हैं तुम्हें यहाँ
रखती है अकसर
दोनों को जोड़ कर
ये यादें भी ना! बड़ी अजीब है

यादें कैसी कैसी?
कभी आबादी में अकेला
तो कभी वीराने आबाद करती
खेलती हैं कभी छितरे बादलों से
बटोर लाती है वे तुम्हारे सब्ज लफ़्ज़
फुसफुसाती है प्यार से कानों में
बिम्बित करती है तुम्हें
फूलों के महकते परागण में
झिलमिलाते ताल के जल में
दौड़ती ही फिरती हैं
यहाँ से वहाँ, वहाँ से यहाँ
ये यादें भी ना! कितनी करीब हैं
नाबाद है, पूँजी है, सनद है
मन की तिजोरियों में

रामनारायण सोनी
२६. १ .२१

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