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Thursday, 4 March 2021

दीप की लौ सा जलूँ

दीप की लौ सा जलूँ वह पथ तुम्हें जो दीख जाए
मेघ सा हो कर गलूँ मैं जब धरा पर बीज आए।
कैद सीपी में रहूँ मैं जब तलक मोती न निबजै
बीनता हूँ कटकों को राह तू जिस ओर जाए।।

🌹डबउबाये हैं नयन क्यों क्या कसक मन में धँसी
काँपते कर में विकलता क्यूँ फाँस मन में है फँसी।
मैं खड़ा हूँ सन्तरी बन तुम अभय के शल्क में हो
फेंक दो बीमार सोचें अब अधर पर हो हँसी।।

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन