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Thursday, 4 March 2021

कविता की कहानी


जब कविता 
थी अपने शैशवकाल में,
नन्हे नन्हे डग चलीं थी
भावनाएँ अँकुआ रही थी
हल्के जर्द पड़े डायरी के पन्नों में 
सूखी वे गुलाब की पंखुडियों
मुस्कुराई, महमहाई...!
काल की कील पर टँगी
सुइयाँ पीछे दौड़ी, 
ठिठकी, कहीं ठहर गई
वहाँ, जहाँ लिखीं थी
ढाई आखर की
छोटी सी विराट कहानी...!

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन