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Wednesday, 18 August 2021

सुन ए जिंन्दगी

सुन ए जिन्दगी!
तुम्हारे पास तो मील के कई पत्थर हैं
कुछ सुडौल सुन्दर से हैं उनमें
याद करना मुझे तुम
अपनी ठोड़ी पर उँगली टिकाए
उन सुन्दर पत्थरों पर बैठ कर
फुसफुसाना अपनी जुबान मैं
और सुन कर मैं...
मैं यहाँ बैठ कर मुस्कुराऊँगा
तुम भी मुस्कुराना मेरे संग संग

रामनारायण सोनी
२६.०७.२१

सुन ए जिन्दगी!
शूलों, भूलों और
परेशानियों के पलों में
इन्हे वो कहीं देख न ले
मेरे माथे पर पड़ी सिलवटों को
छिपा कर कही रख देना
बदले में मुट्ठी भर
मुस्कान बिखेर देना!
बस!

   रामनारायण सोनी

मुक्तक

प्रार्थना में बन्धन कहाँ? 
प्रेम में अनुबन्ध कैसा? 
अर्चना में प्रतिबन्ध कैसा? 
आराधना आत्मा की पुकार है 
आस्था जीवन का आधार है
सुमिरन प्रभु नाम की गुंजार है

नव प्रभात यह विहगों का, रव ले कर आया है
नव पल्लव, नव कुसुम, नवल दल, सर नीरज मुस्काया है
रजनी ने नीली चूनर में, तारक थाल सजाया है
नेहसिक्त इस पुण्य धरा ने कण कण यूँ महकाया है

सुनो सुनयने!

सुनो सुनयने!
ये रात और दिन!
रात, जो नींद कम
जाग अधिक ले कर आती है
दिन, जो थकन
और पेशानियों पर
पसीने छोड़ जाता है
लेकिन बीच में!
इसी बीच में थोड़े पलों के लिये
संध्या गौओं की
पावन धूलियाँ ले कर आती है!
मल जाती है गुलाल
तुम्हारे रक्तिम कपोलों पर
निम्बोलियों की कड़वी मीठी
महमहाती गन्ध के बीच
हरियाई डाल पर रक्त कण्ठी सुग्गे
चिटिर-पिटिर करते चिंचियाते हैं
तुम्हारी ही तरह
चुलबुले चंचरीक की गुन-गुन सुर
कानों में मथु घोल जाते हैं
अचानक मेरे स्वप्न पाँखी
प्रीति के गहन आकाश में
डैने फैलाये तुम्हारे
अलकों पर उतर आते है
कुछ भार सा महसूस करता हूँ
अपने काँधे पर
कि तुम हो कर जैसे त्रिभंगी
अपना शीश टिकाए हो
मधुभार से

रामनारायण सोनी
४.७.२१

कौन हो तुम?

कौन हो तुम?
कौन हूँ मैं?
शायद "मैं" और "तुम"
"हम" ही हैं
यह विलय कैवल्य है
यह विलयन प्रेम है
यह प्रेम तब अलौकिक है
यह रसायन अद्भुत है
*"रसो वै सः"*
यह देहात्म भाव शून्यता
हमारे प्रेम का परिमार्जन है
प्रेम दीवानगी है वह
जो पैरों में फुँघरू बाँध देता है
प्रेम धारा है वह
जो हृदय के गर्भ से बहना शुरू करती है।
प्रेम वह आह्लाद है
जो मरुमय जीवन में आनन्द भर देता है
बाहें जहाँ करुणा से फैल जाती हैं
प्रेम में प्रधान तू है और अन्तिम भी तू है 
तो फिर "मैं" हूँ ही कहाँ।
बस तू ही तू है।

रामनारायण सोनी

शब्दों के उस पार
 भावों के सागर में
   बस संधिकाल वही है
  मैं और तुम...

तुम से तुम को मिलवाऊँ

आओ तुम्हें मैं हँसना सिखाऊँ
जीवन का वह छोर दिखाऊँ
बैठे हम में सहज सलोने
ईश्वर का दर्शन करवाऊँ।।
तुम भी तो मुझ जैसे ही थे
चंचल चपल हठीले नटखट
हाथ थाम कर आओ संग संग
तुम को तुम से ही मिलवाऊँ।।
  तुम को तुम से ही मिलवाऊँ।।

जाने कौन गली में खोये
गुपचुप क्यों रोया करते हो
जीवन की भारी गठरी को
बेमन से ढोया करते हो ।
कूद पड़ो तुम उस अतीत में
जिसमे मस्ती यूँ झरती थी
किलकारी भरती सखियों की
वो टाँगा टोली तुम्हें दिखाऊँ।।
  तुम को तुम से ही मिलवाऊँ।।

कैंची से सीखी थी सायकल
कीचड़ में गेड़ी चलती थी
बीले की खाली खोलों की
कोयल रस्सी से बजती थी।।
लकड़ी के घोड़े पर बैठे
कैसे तुम दौड़े फिरते थे
उस कुलाम डाले की डाली
पर फिर तुमको लटकाऊँ।।
  तुम को तुम से ही मिलवाऊँ।।

ढूँढो फिर से उन यारों को
फिर से बचपन खड़ा हो सके
जिनको देख तुम्हारी आँखे
नेह नीर से सजल हो सके
उन भूले बिसरे रिश्तों की
स्वर्णिम सी उन शाम सुबह की
मद मस्ती की उस बस्ती की
मस्त गली में तुम्हे घुमाऊँ।।
  तुम को तुम से ही मिलवाऊँ।।

टिम टिम कर जलते दीये की
मद्धिम मद्धिम छनी रोशनी
जमी काजली आले की से
चलो डिठौना तुम्हें लगाऊँ।।
ताल तलैया नदी छापरी
याद तुम्हें भी आती होगी
चुरा लिया करते थे अमिया
उस बगिया को तुम्हें दिखाऊँ।।
  तुम को तुम से ही मिलवाऊँ।।

रामनारायण सोनी
१७.०८.२१


Wednesday, 16 June 2021

Love is a unidirectional



People say, they fall in love. See! Is love a slippery mud well? and/or is it a place of an accident. 
I don't think so. Look! Love is an ocean where one can be submerged into it just not willing to come out of it. 
Love is like a diode having unidirectional feature i.e. it's an act to enter into, certainly which has no exit. Love is an act of purest form in the entire Universe. So love is God.

Ramnarayan Soni
05.05.21

चाँद-रात


रिश्ता मेरा तुम्हारा
जैसे चाँद से रात का
जैसे अल्फ़ाज से आवाज का
जैसे नदी से धार का
जैसे प्रियतम से मनुहार का!!
हाँ!
देखता हूँ तुम्हें!
जब बन्द आखों से
कैसा अप्रतिम सौन्दर्य हो तुम!!
सुनता हूँ तुम्हें
जब कान बन्द कर के
कैसा एक मधुर सा गीत हो तुम!!
छुअन का अहसास
जैसे समीरण सा मृदुभास
मेरी जीवन बगिया का
जैसे मधुरिम मधुमास हो तुम!!

       रामनारायण सोनी
         ०५.०५.२१

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