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Wednesday, 12 October 2016

दीप कविता का जलाना चाहता हूँ

उम्र की चादर समय ने ही कुतर दी
कुछ पलों को जोड़ कर पैबंद भर दूँ,
झड़ चुके जो पात तरु के कब जुड़े
आज प्रिय कुछ पुष्प तेरे शीश धर दूँ,
मौन साधे रैन भी है घोर तम की ।
   
      रोशनी को फिर बुलाना चाहता हूँ।
      दीप कविता का जलाना चाहता हूँ।।

ढह चुका प्राचीर प्रीतम के नगर का
एक कोना ढूँढ कर बगिया सजा दूँ.
हमने बोये जो सपन थे प्यार के
भग्न आले खोज कर के ठीक कर दूँ,
फेंक कर दुःस्वप्न सारे इस घड़ी मैं।

       रोशनी को फिर बुलाना चाहता हूँ।
       दीप कविता का जलाना चाहता हूँ।।

Wednesday, 5 October 2016

चाँदनी चुभती रही

क्यों हुए आतुर हमारी
नापने गहराई मन की
क्यों छुआ है घाव मेरा
जागती है पीर तन की।
चाँदनी भी चुभ रही है
जो जगाती याद उनकी
कोई चुनरी तान दे अब
तारकों की और तम की।।

सूझता ना पथ कोई भी
गर्दिशों की धुन्ध इसमें
फूल हैं न पात है अब
इस चमन की अंजुमन में।
ये कदम भी आज अँकड़े
वे नहीं हैं  जब सफर में
डूबता अभिसार गहरी
क्षोभ की नीरव निशा में।।

दीप की लौ सी किरण भर
रोशनी गलती रही
झर झराते अश्रु कण ले
मानिनी जगती रही।
आस के नभ में विचरते
स्वाँस के पंछी रुपहले
प्रीत के पाहुन पधारो
प्राण के जाने से पहले।।



मन की पर्तें मन ही खोले

मन है आज सखी री मेरा
बोझिल कुछ कुछ अलसा कुछ कुछ
मन की पर्तें मन ही खोले
उघरी कुछ कुछ, बिखरीं कुछ कुछ

कभी झूलता उनके संग संग
रुचिर हिंडोले कर के कुछ कुछ
मन की सिगरी मन ही खोले
हृदय गड़ी थी छाया कुछ कुछ

गाता सुनता गीत स्वयं ही
ढोल मजीरे रुनझुन कुछ कुछ
तार एक बस तानपूरे का
मेघ मल्हार ये गाता कुछ कुछ

कैसा है मन निपट बावरा
भीड़ भाड़ में खोजे कुछ कुछ
नयन कटोरे रीत गए पर
आस लगी है अब भी कुछ कुछ

तब से टँगा अलगनी पर मन
कुछ कुछ तुमने इसे कहा था
खोल किवारे लगा टकटकी,
चौंक पड़ा बिन आहट कुछ कुछ

इसके क्रन्दन के विह्वल स्वर
क्या तुम तक ना पहुँचे कुछ कुछ
या पथराई भाव नगरिया
स्मृतियाँ क्या बची है कुछ कुछ?

Friday, 30 September 2016

स्वप्न बुलाता हूँ


स्वप्न कब किसके हुए, सब जानते हैं
आज मैं सारे जतन कर सो रहा हूँ
कल सपन के गीत का आरोह मैं था
वे भरेंगे रागिनी इस यामिनी में
बाँध लूँगा किंकिणी उन मृदु करों में
तार मैं अपने हृदय के कस रहा हूँ।
    स्वप्न का सुरमई झरोखा खोल कर
    प्राण! हौले से हृदय में तुमही आ जाना।।

















टाँक तारे लाएगी चूनर सजीली यामिनी
साथ होगी संगतें भी झुनझुनाते झींगुरों की
दूर बजती थालियाँ संकेत देगी मोद की
थाप की थिरकन भरी पिघली शिराएँ
झूमती उन्मादिनी लिपटी लताएँ
साथ होंगी हूँक भी वन कुंजरों की।।
    स्वप्न का सुरमई झरोखा खोल कर
    प्राण! हौले से हृदय में तुमही आ जाना।।

जब सजेगी यामिनी भी, रागिनी भी
जब बजेगी दुन्दुभी मन मोदनी भी
जब सितारे रोशनी मद्धिम बिखेरें
तब नगर होगा सभी से बेखबर
स्वप्न का सुरमई झरोखा खोल कर
प्राण! हौले से हृदय में तुमही आ जाना।।

    स्वप्न का सुरमई झरोखा खोल कर
    प्राण! हौले से हृदय में तुमही आ जाना।।


Tuesday, 27 September 2016

प्रतीक्षा उनकी


खो गया मैं ही कहीं फिर
कुन्द कुंजों में उलझ कर
प्यास अधरों पर लिपटती
दामिनी घन में मचलती
कौन बन्दी धड़कनों को
धड़कने कह पाएगा
क्या कभी जो स्वप्न बिखरे
फिर मुझे लौटाएगा।।

मौन गुम्फित और सहमे
इस हृदय की कोटरों में
शब्द जो छाया बने हैं
प्रीत के रस से सने हैं
कौन धुंधली सांझ वह
दीप की झिलमिल सुनहली
राह तकती प्रियतमा से
फिर मुझे मिलवाएगा।।


पात पीपल के मचाते
शोर बजते कान बींधे
कोयलें, सुग्गे, पपीहे
मौन क्यों हैं इन पलों में
कौन सी है वे दिशाएँ,
गुम हुए हैं रास्ते, पगडंडियाँ
कौन वे पद चाप पथ की
फिर मुझे सुनवाएगा।।

अधरों की पीड़ा


जिन पर शब्द युगों तक ठहरे 
इन अधरों की पीड़ा समझो
बिछे रहे जो आगम पथ में 
थकित नयन की साधे समझो 
जिस उपवन में पतझड़ ठहरा
उसमें भ्रमर नहीं है आते
जिस कुटीर में छाव नहीं हो
उनमें पथिक नहीं रुक पाते
खुले नयन से स्वप्न देख् कर 
पानी पर क्यों चित्र बनाते 
जो बस्ती वीरान पड़ी हो
उसमें पाहुन कभी न आते
अनछुई छुअन की आस पोर को
तुहिन कणों की प्यास भोर को
तुम अनंत के पथिक बिचारे
खोज रहे अनजान ठौर को
तुम आशा के दीप तुम्हारा
आलम्बन् क्या गठबंधन है
मैं विस्मित हूँ स्तम्भित हूँ
कितना विश्वास अटल है

Sunday, 25 September 2016

"मैं गीत शान्ति के गाता हूँ"

"मैं गीत शान्ति के गाता हूँ"

वेदों की अमृत वाणी को, 
अपने शब्दों में गाता हूँ।
कैसे जग में शान्ति रहे, 
उनका संदेश सुनाता हूँ।।
ऋषियों के पावन अन्तस में
सब वेद ऋचाएं उतरी हैं।
चिन्तन की मंगल धारा के,
कुछ-कुछ संकेत बताता हूँ।।
     मैं गीत शान्ति के गाता हूँ।।

सूरज का सबको तेज मिले, 
जल स्वच्छ मिले जीवन में।
धरती का वैभव सबका है, 
बसा ईश कण-कण में।।
अंबर जो मेरे ऊपर है वह, 
मेरा भी है सबका भी।
औषध है तरु, पादप, पल्लव, 
ध्यान रखें सब इनका भी।।

केवल अपने ही सुख को हम, 
शान्ति समझ बैठे हैं।
जग के शेष प्रजाजन को हम, 
विष के घूँट पिला बैठे हैं।।
अब तक पुरखों की थाती को, 
हमने खूब भुनाया है।
जान नहीं पाए हम भू में, 
जल में कितना गरल मिलाया है।।

शान्ति नहीं बिकती बजार में, 
खोज हृदय में करनी होगी।
बाहर की मृगतृष्णा तज कर, 
अन्तर की भी सुननी होगी।।
भीतर है शान्त महासागर, 
आनन्द जहाँ नित बसता है।
करुणाकर की मृदु-करुणा का, 
पीयूष झमाझम झरता है।।

संग चलो और मिल कर बोलो, 
मन भी संग मिला लो सब में।
एक अकेले सुख को छोड़ो, 
शान्ति कपोत उड़ा लो नभ में।।
ऋषियों के पावन अन्तस में
सब वेद ऋचाएं उतरी हैं।
चिन्तन की मंगल धारा के,
कुछ-कुछ संकेत बताता हूँ।।
     मैं गीत शान्ति के गाता हूँ।।
     मैं गीत शान्ति के गाता हूँ।।


reference

●【ॐ संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्, 
देवा भागम् यथा पूर्वे संजानाना उपासते।।'
(ऋग्वेद-)

यानी हम सब साथ-साथ चलें, प्रेमपूर्वक वार्तालाप करें, हमारे मन एक हों। जिस प्रकार हमारे विद्वान पूर्वज सौहार्दपूर्ण रहते थे, उनका अनुसरण करते हुए उसी प्रकार साथ रहें।

ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति: पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।
वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति: सर्वँ शान्ति: शान्तिरेव शान्ति: सा मा शान्तिरेधि॥

ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥ (यजुर्वेद)】●

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