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Tuesday, 27 September 2016

प्रतीक्षा उनकी


खो गया मैं ही कहीं फिर
कुन्द कुंजों में उलझ कर
प्यास अधरों पर लिपटती
दामिनी घन में मचलती
कौन बन्दी धड़कनों को
धड़कने कह पाएगा
क्या कभी जो स्वप्न बिखरे
फिर मुझे लौटाएगा।।

मौन गुम्फित और सहमे
इस हृदय की कोटरों में
शब्द जो छाया बने हैं
प्रीत के रस से सने हैं
कौन धुंधली सांझ वह
दीप की झिलमिल सुनहली
राह तकती प्रियतमा से
फिर मुझे मिलवाएगा।।


पात पीपल के मचाते
शोर बजते कान बींधे
कोयलें, सुग्गे, पपीहे
मौन क्यों हैं इन पलों में
कौन सी है वे दिशाएँ,
गुम हुए हैं रास्ते, पगडंडियाँ
कौन वे पद चाप पथ की
फिर मुझे सुनवाएगा।।

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन