जो मिलता ही नहीं है
होती है उसकी ही इबादत
ऐसा होता क्यों है इस इश्क में?
इश्क इबादत है?
या इबादत ही इश्क है?
या कि यही सब इश्क ही है?
हदों के पार बेहद है
सिफर का ही सफर जद है
इश्क का सौक ही मद है
इश्क तो इश्क ही बस है
जो मिलता ही नहीं है
होती है उसकी ही इबादत
ऐसा होता क्यों है इस इश्क में?
इश्क इबादत है?
या इबादत ही इश्क है?
या कि यही सब इश्क ही है?
हदों के पार बेहद है
सिफर का ही सफर जद है
इश्क का सौक ही मद है
इश्क तो इश्क ही बस है
मिट्टी ने सुगबुगाया
गली मैं, तपी मैं
पर जब बना कुछ
तो नाम मेरा बदल गया
मिट्टी से हो गई हूँ "दिया"
बाहर फिर एक तपन है
बाती में फिर एक अगन है
पर अब मुझसे एक उजास है
तिमिर से तुमूल की प्यास है
गुमसुम ये राहें रोशन हुई
दिशाएँ फैल गई सब ओर
तपन में ढूँढ लिया है
मैने चिर सुख
बाँटते रहने का सुख
मैं वही अमर मिट्टी हूँ
चाहे मैं, दिया हूँ तुम्हारे लिये
मैं फिर भी वही मिट्टी हूँ
रामनारायण सोनी
(२९.१०.१९)
है बौने दीप का साहस अँधेरी रात डरती है
भले हो कालिमा भारी अमावस भी सिहरती है।
अँधेरी आस्थाओं में भरम के तन्तु गलते हैं
प्रकट हो रोशनी के क्षण सभी दुःस्वप्न जलते हैं।
किरण का प्रस्फुटन ही विजय की नीव रखता है
तमस पर जीत की लिखी कहानी साथ रखता है
धरा की ओढ़नी में ये सितारे दीप के टाँके
सुहागन रात मस्ती में अहा! मधुकुञ्ज से झाँके
रंगोली मेरे आँगन की ये है प्रीत का परिमल
बताशे खील और धानी सजा इस साँझ का आँचल।
जो लहराते नहीं
वे झंडे नहीं हैं
जो उगते नहीं
वे बीज नहीं है
जो पसीजे नहीं
वे मानव नहीं है
जिनमें उमंग नहीं
वे जीते नहीं है
वक्त चलता ही रहा
हर्फ लिक्खे रह गए
घिसटते हुए साँप की
छूटी उन लकीरों जैसे
कभी चमकती है
लकीरें अग्नि पथ सी
कभी धुँधियाती है
बुझी यादों के धुऐं सी
लकीरें हाथों की
सिलवटें माथों की
गुजरते वक्त की
सियाही रातों की
वक्त चलता ही रहा
हर्फ लिक्खे रह गए
पंख बदलने से
आकाश नही बदलता
सूरज भी तो वही है
जहाज बदलने से
सागर नहीं बदलता
जल भी तो वही है
सूरत बदलने से
सीरत नही बदलती
आदमी तो वही है
शरीर बदलने से
चोला बदलता है
आत्मा तो वही है
छन्दों का विन्यास छूटा
छद्मों का जाल टूटा
कविता कुछ फुसफुसाई
दामन में है जुन्हाई
चलो चौपाल पर
बैठे है थके रिश्ते
कुछ बाएँ कुछ दाएँ
अनमने निढाल से
आओ गले लग जाएँ
सुनो!
मुर्गे ने बाँग दी है
डूबा सूरज
फिर ढूँढ लाएँ