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Tuesday, 3 December 2019
धरा गगन आकुल है
Tuesday, 19 November 2019
खिलखिलाते दो प्रसून
दो फूलों का सहज सौंदर्य
बिखरता है भीतर से बाहर
जैसा भीतर वैसा बाहर
न मुखौटे, न दुराव
न त्याग, न चुनाव
अलौकिक संवाद
न वाद न, न परिवाद
बस मुखर ही मुखर
बस आह्लाद के स्वर
रामनारायण सोनी
Wednesday, 13 November 2019
मन क्यों भिगोते हो
बरस कर प्यार बन हर दिन
मेरा मन क्यों भिगोते हो
नमी बन कर मेरी आँखों में
अक्सर क्यों उतरते हो।
नहीं हो सामने फिर भी
यहाँ हर दम गुजरते हो
रुकी हैं धड़कनें जब भी
समा कर क्यों धड़कते हो।।
ऋणी हूँ उन हवाओं का
तुम्हें जो छू के आती है
मधुर सी लोरियाँ बन कर
प्रणय के गीत गाती है
बजाती पैंजनी मद्दम
हृदय को गुदगुदाती है
कैसे भूल जाऊँ थपकियाँ
मुझे जो थपथपाती है
आप हैं तो, हम है
कुछ कह सकता हूँ
पर संवाद के लिये...
आप जरूरी हैं
खुश हो सकता हूँ
पर उत्सव तो..
आपके बगैर असंभव है
मुस्कुरा तो सकता हूँ
पर उल्लास तो...
कैसे उतरेगा मन में
साँसें तो चल जाती हैं
यह जिन्दगी तो
आपके बगैर अधूरी है
लौटा जीवन में फिर बसन्त
उठ खड़ा हुआ ले अँगड़ाई,
आशा ने चूमा दिग्दिगन्त।
बीत गया दुःख का पतझड़
लौटा जीवन में फिर बसन्त।।
पथ टेढ़ा मेढ़ा पंकिल हो
पर मन उमंग से भरा रहे।
पग पग पर बाधाएँ होंगी
पर लक्ष्य दृष्टि में धरा रहे।।
कुछ और अभी पल आयेंगे,
पग पग पर आफ़त लाएँगे।
इतिहासों के वे काले पन्ने
वे फिर फिर अब दोहराएँगे।।
कितनी उल्काएँ गिरती हो
भीषण झंझा की भर भेरी।
हो ऊर्जा जो भुजदण्डों में
किस्मत भी बनती है चेरी।।
सपनों के साँचे बड़े रहें
साहस के काँधे चढ़े रहें।
पौरूष भूधर ले खड़े रहें
अपनी धरती से जुड़े रहें।।
मैं पीड़ा का गायक हूँ
दो पल को जागा फिर
बरसों तक सोया हूँ
आशा के पंखो पर
सपनों को ढोया हूँ
साँसों ने मोहलत दी
उतना भर जी पाया
कतरा भर पानी था
सागर में खो आया
आँसू का मोल यहाँ
बालू से सस्ता है
झूँठों की बस्ती में
साँच हुआ खस्ता है
फूलों की सेज सजी
नीचे बस शूल धरे
सूनी इस अमराई में
गिद्धों के शोर भरे
दोहरे इस चेहरे से
दर्पण भी हार गया
जीवन के उपवन को
पाला क्यूँ मार गया
सुर तो सब मीठे है
कँपते उन तारों के
पिटते हैं ढोल सभी
गीत सजे प्यारों के
जीवन की धारा संग
तिनके सा बहता हूँ
भीतर सौ ज्वाल लिये
बाहर से हँसता हूँ
Tuesday, 29 October 2019
इश्क तो बस इश्क है
जो मिलता ही नहीं है
होती है उसकी ही इबादत
ऐसा होता क्यों है इस इश्क में?
इश्क इबादत है?
या इबादत ही इश्क है?
या कि यही सब इश्क ही है?
हदों के पार बेहद है
सिफर का ही सफर जद है
इश्क का सौक ही मद है
इश्क तो इश्क ही बस है
About Me
- रामनारायण सोनी
- खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन