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Tuesday, 30 May 2017

मेरे गीत कहीं मर न जाए

मेरे गीतों से निकल गए यदि तुम
विराट शून्य होगा मेरे समक्ष
वह अनन्त और निस्सीम है
देख नहीं पोवेंगे उसे नेत्र मेरे

बिखर जाएगा हृदय का स्पन्दन
सुन्दर साज सभी होंगे
पर बिना स्वर के मृत होंगे
शिल्प में सौंदर्य तो होगा अप्रतिम
पाषाण भर होंगे सभी
यदि भीतर तुम न हुए तो
तुम वहाँ मिलोगे कैसे

न शून्य दिखता है,
न पाषाण पसीजता है
न साज गाते हैं
हृदय में तो धड़कनों में
तुम धड़कते हो
मेरे गीत मर न जाए कहीं
बिन तुम्हारे ये बिचारे
ये तुम्हें गाते, नृत्य करते
हथेलियों पर फुदकते
बोलते हैं तुम्हारी इबारतें
ढलते हैं तुम्हारे साँचों में

यदि भीतर तुम न हुए तो
तुम वहाँ मिलोगे कैसे
मैं अक्सर तुम्हें ढूँढ ही लेता हूँ
इनमें, इनकी आत्मा तुम ही हो

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन