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Monday, 22 July 2019

नयन अभी भी नीर भरे

करुणा की मेरी झोली में
केवल बासी दर्द भरे हैं
यह कैसा ही बौनापन है
हम हँसने में भी डरे हैं

अनजाने लोगों ने आकर
खुले व्रणों पर नमक धरे हैं
रात गई और प्रात हुई पर
नयन अभी भी नीर भरे हैं

ढली शाम और थके पाँव
विषदंशों के स्राव हरे हैं
हम निर्मम की इस बस्ती में
कितने बेबस आज घिरे हैं

आज इलाजों की मण्डी में
शातिर नश्तर बाज भरे है
कोई जिये मरे कोई भी
सौ सौ पाकिटमार भरे हैं

गुड़िया बन जाऊँ

देखता हूँ जब कभी
चहकते ठुमकते बच्चे को
उन्मुक्त खेलते हुए
जी करता है जी भर कर
वह बच्चा तुम हो जाओ
और मैं हो जाऊं
तुम्हारे हाथों की गुड़िया

सोचता हूँ कभी कभी
छिदी बिंधी बासुरी
बन कर के मैं
अधरों से लग जाऊँ
थोथापन यह है मेरा
एक फूँक से तुम्हारी
मैं रागों से भर जाऊँ

Friday, 19 July 2019

जिन्दगी के नजरिये


एक और शाम हो गई
एक और दिन ढल गया
इस जिन्दगी की किताब से
एक और पन्न्ना फट गया

एक और शाम हो गई
एक और दिन ढल गया
इस जिन्दगी की किताब में
एक और पन्न्ना जुड़ गया

एक और शाम आ गई
एक और दिन सँवर गया
इस जिन्दगी की किताब का
एक और पन्ना  निखर गया

एक शाम आज आई है
एक और दौर चल गया
ग़मों की इस किताब से
एक जाम फिर फिसल गया

एक शाम है धुआँ धुआँ
गगन पहन के गेरूआँ
इस जिंदगी की गोद में
है कँप रहा रुआँ रुआँ

एक और शाम हो गई
एक और दिन ढल गया
इस जिन्दगी की किताब को
किसी ने हौले से  छुआ

Monday, 15 July 2019

इश्क उग आया

वक्त की इस बड़ी इमारत में
दो पलों की दरार में
वह मधुर मुस्कान
अंकुरित हुए
पीपल के बीज की तरह
इश्क उग आया
नव कोंपलें सज गई
पौधा यह ...
...हमारा तुम्हारा

Saturday, 29 June 2019

मृदुहास


मन की कोरी चादर पर कुछ स्वप्न धरे हैं
अधरों पर कुछ प्यास गुलाबी ले कर आना
नयनों की कोरों में श्यामल सांझ खिली हो
मदिर मदिर मौसम का मृदुहास लिये आना।

आज तूलिका अंतस के कुछ रंग भरे बैठी है
उसके प्राणों के रेशों से तुम हौले ख़ुद उतराना।
उलझे कुन्तल के वलय सभी उलझे उलझे हों
प्रखर प्रणय की संध्या के मधुमास लिये आना।।

Tuesday, 18 June 2019

मैं वहाँ तुम यहाँ

"मैं वहाँ तुम यहाँ"

मैं ही उतरा था एक दिन!
जैसे परिंदा कोई
उतरता है तुम्हारे आंगन में
बहती थी जहाँ
शीतल मंद सुगन्धित समीरण

मैं ही तो था वह!
इक नन्हे बच्चे सा
अपनी खोई गिल्लियॉ लेने
आ गया हो ऐसे ही,
महके उस उपवन में
जैसे आ जाती है गोरैया
फरफराती उजालदानों पर

न दी दस्तक ही दरवाजे पर 
सरसराते पत्तों ने
पुकारा था तुम्हे नाम लेकर
देखता रहा वक्त रुक कर
तुम्हारी बाहों के झूले पर
हाँ, था वह मैं ही
सिरहाने थे रेशमी अहसास
उतर न पाए थे बोल 
चिपके रह गए हो जैसे
शहदीले अधरों में

लौट कहाँ पाया
पूरा मैं अब तक
छूट गया कुछ-कुछ मैं ही 
साथ चल रहे हो 
तब से अब तलक तुम भी

छूटे हम, पर छूटे कहाँ
फिर ख़ुद-ब-ख़ुद
एक-दूसरे को पाने को
क्योंकि, मैं हूँ वहाँ, तुम हो यहाँ
निरन्तर, अविरल, अविचल

Sunday, 2 June 2019

"वृक्षों के शव पर बैठे हैं"


वृक्षों के शव पर बैठे हो
प्रश्न तुम्हारे प्रश्न हुए हैं
क्यों तपती है धरती माता
क्यों आँगन अंगार हुए हैं।

शासन और प्रशासन दोनों
डंठल बो कर कागज भरते
जंगल के रखवाले खुद ही
जंगल खा कर मिट्टी करते।

इस पावस में मेघ न बरसे
आकर वापस लौट गए हैं
तपती धरा रही प्यासी ही
ताल तलैया रीत गए हैं।

हरियाली के पोस्टर होंगे
सपनों में जंगल देखोगे
लद गए दादी के वे किस्से
मंगल जिल्दों में देखोगे।

झरनों और प्रपातों के शव
उनकी बयाँ कहानी होगी
शेष रही चट्टानो को ही
व्यथा कथा सब गानी होगी।

पीपल वट ऑवल के तरु की
हम पूजा क्यों करते हैं
वृक्षों में देवत्व बसा है
ढोंग धतूरा क्यों धरते हैं।

मेढ़ों पर बूढ़े वृक्षों की
जड़ में मठ्ठा ही भरते हैं
पंछी आ कर चुग जाएँगे
फसल हमारी हम डरते हैं।

अब अभिशाप भुगतने होंगे
हमने कुदरत से खेला है
कृत्रिम खाद ठूँस दी इतनी
मिट्टी अब केवल ढेला है।

दूर नही दिन लिख लो यारों
प्लास्टिक के ताबूत बनेंगें
बिन लकड़ी के सारे शव ही
बिजली के शव-दाह दहेंगे।

रामनारायण सोनी

(02.06.2019)

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