तुम नदी हो
एक बहती नदी
रुकोगी नही,
वापस मुड़ोगी भी नही
मैं खड़ा रहा
बाहें फैलाये
समुन्दर बन कर
कि तुम पहुँचोगी
जरूर एक दिन
मुझ तक
*
*
Monday, 22 July 2019
सूखी नदी
नयन अभी भी नीर भरे
करुणा की मेरी झोली में
केवल बासी दर्द भरे हैं
यह कैसा ही बौनापन है
हम हँसने में भी डरे हैं
अनजाने लोगों ने आकर
खुले व्रणों पर नमक धरे हैं
रात गई और प्रात हुई पर
नयन अभी भी नीर भरे हैं
ढली शाम और थके पाँव
विषदंशों के स्राव हरे हैं
हम निर्मम की इस बस्ती में
कितने बेबस आज घिरे हैं
आज इलाजों की मण्डी में
शातिर नश्तर बाज भरे है
कोई जिये मरे कोई भी
सौ सौ पाकिटमार भरे हैं
गुड़िया बन जाऊँ
देखता हूँ जब कभी
चहकते ठुमकते बच्चे को
उन्मुक्त खेलते हुए
जी करता है जी भर कर
वह बच्चा तुम हो जाओ
और मैं हो जाऊं
तुम्हारे हाथों की गुड़िया
सोचता हूँ कभी कभी
छिदी बिंधी बासुरी
बन कर के मैं
अधरों से लग जाऊँ
थोथापन यह है मेरा
एक फूँक से तुम्हारी
मैं रागों से भर जाऊँ
Friday, 19 July 2019
जिन्दगी के नजरिये
एक और शाम हो गई
एक और दिन ढल गया
इस जिन्दगी की किताब से
एक और पन्न्ना फट गया
२
एक और शाम हो गई
एक और दिन ढल गया
इस जिन्दगी की किताब में
एक और पन्न्ना जुड़ गया
३
एक और शाम आ गई
एक और दिन सँवर गया
इस जिन्दगी की किताब का
एक और पन्ना निखर गया
४
एक शाम आज आई है
एक और दौर चल गया
ग़मों की इस किताब से
एक जाम फिर फिसल गया
५
एक शाम है धुआँ धुआँ
गगन पहन के गेरूआँ
इस जिंदगी की गोद में
है कँप रहा रुआँ रुआँ
६
एक और शाम हो गई
एक और दिन ढल गया
इस जिन्दगी की किताब को
किसी ने हौले से छुआ
Monday, 15 July 2019
इश्क उग आया
दो पलों की दरार में
वह मधुर मुस्कान
अंकुरित हुए
पीपल के बीज की तरह
इश्क उग आया
नव कोंपलें सज गई
...हमारा तुम्हारा
Saturday, 29 June 2019
मृदुहास
मन की कोरी चादर पर कुछ स्वप्न धरे हैं
अधरों पर कुछ प्यास गुलाबी ले कर आना
नयनों की कोरों में श्यामल सांझ खिली हो
मदिर मदिर मौसम का मृदुहास लिये आना।
आज तूलिका अंतस के कुछ रंग भरे बैठी है
उसके प्राणों के रेशों से तुम हौले ख़ुद उतराना।
उलझे कुन्तल के वलय सभी उलझे उलझे हों
प्रखर प्रणय की संध्या के मधुमास लिये आना।।
Tuesday, 18 June 2019
मैं वहाँ तुम यहाँ
About Me
- रामनारायण सोनी
- खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन