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Tuesday, 10 September 2019

मस्त फ़कीरी

मैं....
मैं अधूरा ही अच्छा हूँ
  और
   भरने को राजी हूँ
    इसीलिये तो शायद
     सुनने, पढ़ने, गुनने को
      खाली हूँ
   मन मेरा मस्त फ़कीरी में

    रामनारायण सोनी

खोये खोये

खोये खोये

कविता में से
आदमी खो गया है
और
आदमी में से
  कविता खो गई है
एक आता है
तो दूसरा जाता है
सब चल रहे हैं
पहुंचेंगे भी कहीं न कहीं
   पर मिलेंगे कैसे
कविता में से
आदमी खो गया है
   वे ढूँढते क्यों नहीं
    एक दूजे को

Thursday, 5 September 2019

वक्त की पोटली में

खुद को छोड़ गए थे मुझ में
फिर मैं तुम में छूट गया
न मैं ख़ुद ही लौट सका
न लौटा पाया तुम्हें भी

बँधे हैं हम अभी भी
वक्त की ख़ूबसूरत पोटली में
साथ साथ, एक साथ

Wednesday, 4 September 2019

राजी हो विराट क्या

हे प्रभो!
राजी हो क्या विराट?
बँधने इन पाशों में

मेरा तो काम ही
बस प्रार्थना भर है
क्या मेरी प्रार्थना में
तैयार हो बँधने को?

राजी हो क्या विराट?
बँधने इन पाशों में

रीत गए हैं नयन
बीत गए वे अयन
श्वास की अभ्यर्थनाएँ
प्राण में बस वर्जनाएँ
इस हृदय की वीथियों में
शेष कुछ अभिव्यंजनाएँ
आस के तन्तु बचे हैं

राजी हो क्या विराट?
बँधने इन पाशों में

शब्दों में, भावों में
श्रद्धा के दावों में
दो जुड़े हाथों में
मुँदी मुँदी आखों में

राजी हो क्या विराट?
बँधने इन पाशों में

Tuesday, 20 August 2019

यहीं तक

यहीं से यहीं तक

दर्द के अनुबंध ले कर
  पीर छाती में गड़ी है
मौन भाषा प्रेम की है
  प्रीत द्वारे आ खड़ी है।

क्यों हृदय की वीथियाँ
  फिर हुई निस्पंद सी है
छोड़ दो मन का भरम
  यह ऋतु मधुमास सी है।

Saturday, 10 August 2019

कव्य

यह नदी अभिशप्त सी है

जल नही बहता यहाँ
यह लगभग सुप्त सी है

घाट सब मरघट बड़़े है
प्यास पीते जीव जन्तु
धार, लहरें लुप्त सी है
यह नदी अभिशप्त सी है

पालती थी सभ्यताएँ
धर्ममय और तीर्थमय हो
संस्कृति विक्षिप्त सी है
यह नदी अभिशप्त सी है

खेत बनती थी उपजती
तरबूज, खरबूज ककड़ियाँ
अब रेत केवल तप्त सी है
यह नदी अभिशप्त सी है

प्राण उसके पी गई
लोलुपी जन की पिपासा
वासनाएँ लिप्त सी है
यह नदी अभिशप्त सी है

हम विकासों के कथानक
तान कर सीना दिखाते
सब शिराएँ रिक्त सी है
यह नदी अभिशप्त सी है

बस बाढ़ ही ढोती रहेगी
शेष दिन निःश्वास होंगे
जिन्दगी संक्षिप्त सी है
यह नदी अभिशप्त सी है

रामनारायण सोनी

Saturday, 3 August 2019

दुआएँ उनकी

सब चुप थे..
दुआओं के उठे वे हाथ
..कुछ जाने पहचाने
..कुछ अपने कुछ बेगाने
पता नहीं कहाँ कहाँ से
कब कब आये
पीड़ा, कम्प, भय को
  चले गए चुपचाप
  मुझ से दूर धकेल कर

और मैं, 
   हाँ! मैं!!
जैसे धूल झाड़ कर
फिर खड़ा हो गया हूँ

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन