मैं....
मैं अधूरा ही अच्छा हूँ
और
भरने को राजी हूँ
इसीलिये तो शायद
सुनने, पढ़ने, गुनने को
खाली हूँ
मन मेरा मस्त फ़कीरी में
रामनारायण सोनी
मैं....
मैं अधूरा ही अच्छा हूँ
और
भरने को राजी हूँ
इसीलिये तो शायद
सुनने, पढ़ने, गुनने को
खाली हूँ
मन मेरा मस्त फ़कीरी में
रामनारायण सोनी
खोये खोये
कविता में से
आदमी खो गया है
और
आदमी में से
कविता खो गई है
एक आता है
तो दूसरा जाता है
सब चल रहे हैं
पहुंचेंगे भी कहीं न कहीं
पर मिलेंगे कैसे
कविता में से
आदमी खो गया है
वे ढूँढते क्यों नहीं
एक दूजे को
खुद को छोड़ गए थे मुझ में
फिर मैं तुम में छूट गया
न मैं ख़ुद ही लौट सका
न लौटा पाया तुम्हें भी
बँधे हैं हम अभी भी
वक्त की ख़ूबसूरत पोटली में
साथ साथ, एक साथ
हे प्रभो!
राजी हो क्या विराट?
बँधने इन पाशों में
मेरा तो काम ही
बस प्रार्थना भर है
क्या मेरी प्रार्थना में
तैयार हो बँधने को?
राजी हो क्या विराट?
बँधने इन पाशों में
रीत गए हैं नयन
बीत गए वे अयन
श्वास की अभ्यर्थनाएँ
प्राण में बस वर्जनाएँ
इस हृदय की वीथियों में
शेष कुछ अभिव्यंजनाएँ
आस के तन्तु बचे हैं
राजी हो क्या विराट?
बँधने इन पाशों में
शब्दों में, भावों में
श्रद्धा के दावों में
दो जुड़े हाथों में
मुँदी मुँदी आखों में
राजी हो क्या विराट?
बँधने इन पाशों में
यहीं से यहीं तक
दर्द के अनुबंध ले कर
पीर छाती में गड़ी है
मौन भाषा प्रेम की है
प्रीत द्वारे आ खड़ी है।
क्यों हृदय की वीथियाँ
फिर हुई निस्पंद सी है
छोड़ दो मन का भरम
यह ऋतु मधुमास सी है।
यह नदी अभिशप्त सी है
जल नही बहता यहाँ
यह लगभग सुप्त सी है
घाट सब मरघट बड़़े है
प्यास पीते जीव जन्तु
धार, लहरें लुप्त सी है
यह नदी अभिशप्त सी है
पालती थी सभ्यताएँ
धर्ममय और तीर्थमय हो
संस्कृति विक्षिप्त सी है
यह नदी अभिशप्त सी है
खेत बनती थी उपजती
तरबूज, खरबूज ककड़ियाँ
अब रेत केवल तप्त सी है
यह नदी अभिशप्त सी है
प्राण उसके पी गई
लोलुपी जन की पिपासा
वासनाएँ लिप्त सी है
यह नदी अभिशप्त सी है
हम विकासों के कथानक
तान कर सीना दिखाते
सब शिराएँ रिक्त सी है
यह नदी अभिशप्त सी है
बस बाढ़ ही ढोती रहेगी
शेष दिन निःश्वास होंगे
जिन्दगी संक्षिप्त सी है
यह नदी अभिशप्त सी है
रामनारायण सोनी
सब चुप थे..
दुआओं के उठे वे हाथ
..कुछ जाने पहचाने
..कुछ अपने कुछ बेगाने
पता नहीं कहाँ कहाँ से
कब कब आये
पीड़ा, कम्प, भय को
चले गए चुपचाप
मुझ से दूर धकेल कर
और मैं,
हाँ! मैं!!
जैसे धूल झाड़ कर
फिर खड़ा हो गया हूँ