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Thursday, 5 September 2019

वक्त की पोटली में

खुद को छोड़ गए थे मुझ में
फिर मैं तुम में छूट गया
न मैं ख़ुद ही लौट सका
न लौटा पाया तुम्हें भी

बँधे हैं हम अभी भी
वक्त की ख़ूबसूरत पोटली में
साथ साथ, एक साथ

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन