भाव निर्झर, रूह की राहत, प्रेम और समर्पण
खुद को छोड़ गए थे मुझ में फिर मैं तुम में छूट गया न मैं ख़ुद ही लौट सका न लौटा पाया तुम्हें भी
बँधे हैं हम अभी भी वक्त की ख़ूबसूरत पोटली में साथ साथ, एक साथ
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