भाव निर्झर, रूह की राहत, प्रेम और समर्पण
खोये खोये
कविता में से आदमी खो गया है और आदमी में से कविता खो गई है एक आता है तो दूसरा जाता है सब चल रहे हैं पहुंचेंगे भी कहीं न कहीं पर मिलेंगे कैसे कविता में से आदमी खो गया है वे ढूँढते क्यों नहीं एक दूजे को
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