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Thursday, 4 March 2021

कविता की कहानी


जब कविता 
थी अपने शैशवकाल में,
नन्हे नन्हे डग चलीं थी
भावनाएँ अँकुआ रही थी
हल्के जर्द पड़े डायरी के पन्नों में 
सूखी वे गुलाब की पंखुडियों
मुस्कुराई, महमहाई...!
काल की कील पर टँगी
सुइयाँ पीछे दौड़ी, 
ठिठकी, कहीं ठहर गई
वहाँ, जहाँ लिखीं थी
ढाई आखर की
छोटी सी विराट कहानी...!

कोई तो भगीरथ है

कोई तो भगीरथ है
  जो उतार लाया 
   गंगा को स्वर्ग से
न तो मैं गंगा हूँ
  न ही भगीरथ
कौन है वो
  जो कर गया यह सब
   बस एक अहसास है मुझे
   बस एक अबोध सा बोध है
पर जो कुछ भी है
 कितना  सुन्दर है
  कृपा का वर्षण है
  तुम-हम बस भींगते रहें

छुप्पा-छुप्पी

छुप्पा-छुप्पी

आओ चलें
छुप्पा-छुप्पी खेलें
मैं अपनी आँखें
अपने हाथों से छुपा लेता हूँ
तुम मुझे पीछे से चपत लगा कर
फिर से कहीं छुप जाओ
चलो वह मासूम सा बचपन
फिर ढूँढ लाएँ
फिर बनें हम संगतराश
चिकनी गीली माटी के
गुड्डे गुड़िया बनाएँ
उन लम्हों में सुनहरे बर्क लगाएँ

दीप की लौ सा जलूँ

दीप की लौ सा जलूँ वह पथ तुम्हें जो दीख जाए
मेघ सा हो कर गलूँ मैं जब धरा पर बीज आए।
कैद सीपी में रहूँ मैं जब तलक मोती न निबजै
बीनता हूँ कटकों को राह तू जिस ओर जाए।।

🌹डबउबाये हैं नयन क्यों क्या कसक मन में धँसी
काँपते कर में विकलता क्यूँ फाँस मन में है फँसी।
मैं खड़ा हूँ सन्तरी बन तुम अभय के शल्क में हो
फेंक दो बीमार सोचें अब अधर पर हो हँसी।।

यादें कैसी कैसी

कुछ की आती नहीं

तो किसी की जाती नहीं
कुछ जा कर लौटती हैं फिर फिर
ले जाती है हमें वहाँ
तो कभी लाती हैं तुम्हें यहाँ
रखती है अकसर
दोनों को जोड़ कर
ये यादें भी ना! बड़ी अजीब है

यादें कैसी कैसी?
कभी आबादी में अकेला
तो कभी वीराने आबाद करती
खेलती हैं कभी छितरे बादलों से
बटोर लाती है वे तुम्हारे सब्ज लफ़्ज़
फुसफुसाती है प्यार से कानों में
बिम्बित करती है तुम्हें
फूलों के महकते परागण में
झिलमिलाते ताल के जल में
दौड़ती ही फिरती हैं
यहाँ से वहाँ, वहाँ से यहाँ
ये यादें भी ना! कितनी करीब हैं
नाबाद है, पूँजी है, सनद है
मन की तिजोरियों में

रामनारायण सोनी
२६. १ .२१

Sunday, 7 February 2021

शाम के बाद दिन कहाँ?

वक्त तो वक्त
नज़र भी 
कहीं और ही व्यस्त है।
जानते नहीं?
कि वे फूल 
खिलते है रोज
कि कहीं दृष्टि पड़ जाए 
उन पर भी, पर
शायद पता नहीं इन्सान को
मुरझाई कलियाँ, 
कभी कहाँ खिलती है
आज की नदी आज बही,
कल वही कहाँ मिलती
वक्त है कि मिलता नहीं है
पर वक्त रुकता ही कब है?
*चुक जाऊँ वक्त के साथ*
तो वक्त क्या करे
*शाम के बाद दिन*
*होता ही कब है?*

रामनारायण सोनी

मौन छाया बोलती है

मौन छाया बोलती है

मौन छाया भी बहुत सी बात कहती है
कान मन के तो लगा कर तू सुन जरा।

आज ठहरे इन पलों के पंछियों के साथ हो 
दो घड़ी संग घूम लें तू हाथ थामे सुन जरा।

गुगुदाते मलमली इस दूब को फिर से छुएँ
शाख पर के गुल की महक तो सुन जरा।

शाख के गुल चूमते उस चीर ही की कहानी
यह पवन देता गवाही कान देकर सुन जरा।

ढूँढ लें पदचिन्ह भी इस राह में होंगे कहीं
द्रुम दलों की आहटें यूँ बोलती है सुन जरा।

अंजुरी भर पुष्प की वे पंखुड़ी बिखरी यहाँ
पोर में खुशबू रमी है आज भी तू सुन जरा।

रामनारायण सोनी 

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन