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Sunday, 2 September 2012

यादों के झुरमुट से

तुम यादों के झुरमुट से मेरे मन आँगन आती हो।
सच मानो रीते जीवन में उल्लास जगा जाती हो  । ।

खुले नयन से गहन गगन से, अंतरतम के सरल सृजन से
स्वर्णिम यादों की कड़ियों को,  अवगुंठन में बांध लिया है।  
बसो कहीं या रहो कहीं तुम, मेरी आशालता बनी रहो
मेरे पुष्पित उपवन में मैं, अब एकाकी नहीं रहा हूँ।।

      तुम यादों के झुरमुट से मेरे मन आँगन आती हो।
      सच मानो रीते जीवन में उल्लास जगा जाती हो।।

सपनों पर अपना जोर नहीं, वह उनका बहशीपन है
ले जावें किस ओर उड़ाकर दिग दिगंत का ठौर नहीं।
किससे पूछूं किससे जानूं मेरे प्रिय की बसर कहाँ है
इस बस्ती से उस नगरी तक बंजारे की डगर कहाँ है।।

     तुम यादों के झुरमुट से मेरे मन आँगन आती हो।
     सच मानो रीते जीवन में उल्लास जगा जाती ।।

जब दूर क्षितीज में सांझ ढले, शीतल मंद बयार चले
बरगद की साखों पर पंछी कल-कल कलरव गान करे।
धरती पे हो निविड़ निशा, तारों की चूनर ओढ़ प्रिये
सुरभित पुष्पों की गंध घुली मेरे मन के उपवन  में ।।

    तुम यादों के झुरमुट से मेरे मन आँगन आती हो
    सच मानो रीते जीवन में उल्लास जगा जाती हो ।।

18.09.85

रामनारायण सोनी
  

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