| तुम कितनी सुन्दर हो उषा की लालिमा मुख पर |
| नयन हैं झील से नीले |
| मलय सी गंधवह साँसें |
| घनेरे केश सपनीले |
| मयकलश की स्वामिनी तुम |
| मैं विहग मरु भूमि का |
| तुम प्रणय की रागिनी हो |
| मैं जलद बिन नीर का |
| है पिपासा उम्र भर की |
| प्यार से गलहार की |
| द्वार पे भिक्षुक खड़ा है |
| आस है अभिसार की |
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Sunday, 2 September 2012
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About Me
- रामनारायण सोनी
- खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन
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