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Friday, 19 May 2017

"माँ मेरा अभिनन्दन तू"

"माँ मेरा अभिनन्दन तू"

जीवन का पहला छोर तू ही
जीवन की पहली भोर तू ही
संसृति की सृजन विधाता तू
शीतल करुणा की छाया तू
            मेरी अर्चन - पूजन तू।
            माँ मेरा अभिनन्दन तू।।

प्रेम पला था तेरे उर में
तब जब मैं जन्मा ही न था
स्वप्न बुने थे तूने तब ही
तब जब मैं अपना ही न था
            मेरी अर्चन - पूजन तू
            माँ मेरा अभिनन्दन तू।।

मैं गूँगा था, बोल नहीं थे
रिश्तों का कोई बोध नहीं था
जग का पूरा शब्द कोष ही
प्रथम तुझी ने दिया मुझे था।।
            मेरी अर्चन - पूजन तू
            माँ मेरा अभिनन्दन तू।।

अस्थि चर्म और सारे वय में
तू ही अविरल यूँ बहती है
जैसे नभ के कण-कण में
रंजित पावन पवन रची है।
            मेरी अर्चन - पूजन तू
            माँ मेरा अभिनन्दन तू।।

मेरा अस्तित्व बनाने के हित
किये आचमन पीड़ा के पल
कैसे मोल चुकाऊँ इसका
नत होता है मस्तक पल-पल
            मेरी अर्चन - पूजन तू
            माँ मेरा अभिनन्दन तू।।

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