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Sunday, 21 May 2017

‍♀ याद का मस्तूल

    🚣‍♀ याद का मस्तूल 🚻

तुम्हारी याद का मस्तूल मुझे फिर ले चला मझधार
चलूँ क्यों सुधि सम्हाले मैं  माँझी फेंक दो पतवार
साहिल पर अभी भी चौकसी में तनी संगीन क्यूँ हैं
घिरे है सब तरफ तूफां ये फिर भी हौंसले क्यूँ हैं।

इन हाथों की लकीरों में तुम्हें हर रोज देखा है
उमड़ते बादलो पर भी तेरा ही अक्स देखा है
ठहरी साँस है फिर भी धड़कता दिल मेरा क्यूँ है
पलक मुँदती रही फिर सामने चेहरा तेरा क्यूँ है।

सिफर से इस सफर में ही तेरा विश्वास फलता है
सुआओं में तेरा साया सदा ही साथ चलता है
अकेला हूँ बियाबां में पर लगता साथ ही तू है
लगे मस्तूल यादों के सफर भर साथ ही तू है।

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन