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Tuesday, 30 May 2017

अहसास तुम्हारे होने का

सुनसान सर्द रातें
जब मेरे दिल को
बर्फ सा जमाने लगती है
तेरी यांदों के गर्म लिहाफ
खुद पर ढाँप लेता हूँ

ठिठुरते भाव जब मेरे
न हिम-खण्ड हो जाए
सुरीले गीत तेरे
मैं खुद ही
गुनागुना लेता हूँ

तुम हो कही और मैं कहीं
इस की न है परवाह
ढली है रात जब भी
गगन की घुप्प स्याही में
सितारे लाख होते हैं
उभरते हो उन्हीं में से

तुम्हें चुन करके
मन की पीर
मैं खुद ही
सुना लेता हूँ

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन