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Wednesday, 24 January 2018

सिद्ध मौन


मौन कितने मौन हो तुम
पर सजगता है तुम्हारी
शोर के भीषण प्रहर में
गहनता तुम में है भारी

मौन तो एक साधना है
यह ईश की आराधना है
साध्य का अनुसंधान है
और सिद्धि का सोपान है

स्वयं का जब द्वार खोले
व्यष्टि तब साकार होवे
शांति का वह महासागर
त्वरा मन की क्षीण होवे

मौन भारी शोर पर है
जब पलटता है स्वयं में
बाँसुरी सुनता मधुर यह
प्रलय के भी उस समय में

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन