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Tuesday, 16 January 2018

अनहद बाज रही

(प्रभाती)
*अमृतवेला में*

*सुन अनहद सिर पर बाज रही*
ये बाज रही और गाज रही।
सुन अनहद सिर पर बाज रही।।

बाजे शंख मृदंग बाँसुरी
घन गरजत अति छाज रही।
सुन अनहद सिर पर बाज रही।।

सुन सुन मस्त मगन मन मेरा
चंचलता सब भाग रही।
सुन अनहद सिर पर बाज रही।।

तन के धरम करम सब छूटे
लोक लोग की लाज गई।
सुन अनहद सिर पर बाज रही।।

परमानन्द हृदय में छाया
शून्य समाधि बिराज रही।
सुन अनहद सिर पर बाज रही।।

भ्रकुटि अटारी चढ़ कर देखा
जगमग जोत जगाय रही।
सुन अनहद सिर पर बाज रही।।

अमृत बरसे, आतम हरसे
नवरस बदरी छाय रही।
सुन अनहद सिर पर बाज रही।।

गगन मँडल बिच सेज पिया की
चुन चुन फूल बिछाय रही
सुन अनहद सिर पर बाज रही।।

तन मन की तो सुध सब बिसरी
सहज सरूप समाय रही।
सुन अनहद सिर पर बाज रही।।



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