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Friday, 19 January 2018

सबका सिरजनहारा

*सबका सिरजन हारा*

सबका सिरजन हारा प्रभु तू
सबका सिरजन हारा।।

चौदह भुवन अकासे तारे
अण्ड कटाहे टाँगे
माया जीव जगत जोड़े तब
शुन पर पेर पसारा।
सबका सिरजन हारा प्रभु तू
सबका सिरजन हारा।।

घट घट भीतर घट के बाहर
कन कन दिया सँवारा
अलख निरंजन रूप अरूपा
नेति नेति सब बेद उचारा।
सबका सिरजन हारा प्रभु
तू सबका सिरजन हारा।।

कुल प्रपञ्च की पाँत सवाँरी
पिंजर प्राण पिरोई माला
कैसी अदभुत धमन फुलाई
हिरदै सांस सकारा।
सबका सिरजन हारा प्रभु तू
सबका सिरजन हारा।।
ईड़ा पिंगला और सुसमना
ताँत बनी तंबूरा
कुंडल से ले सहस कँवल तक
चक्कर सात पिंगारा।
सबका सिरजन हारा प्रभु तू
सबका सिरजन हारा।।

पाँच अगन की जोत जलाई
तिनमें आप समाना
रग रत में तू रमता रहता
बन कर पालनहारा।
सबका सिरजन हारा प्रभु तू
सबका सिरजन हारा।।

उन्निस मुख से खावै पीवै
निस दिन भरे उसासा
जीव जतग में पचि पचि मरि है
धापै नहीं बिचारा।
सबका सिरजन हारा प्रभु तू
सबका सिरजन हारा।।

जागे सोते सपना देखे
नींद लगी अति भारी
बिना सपन की नीद सिरानी
आणंद का झनकारा
सबका सिरजन हारा प्रभु तू
सबका सिरजन हारा।।

माया बैठी इन्द्रजाल बुन
चहुँ दिसि दिखे कुहासा
छिन छिन नटी नचावै सिगरे
कैसा अजब नजारा।
सबका सिरजन हारा प्रभु तू
सबका सिरजन हारा।।

चार चतुर चौपाल बिठाए
इक ते इक्क जुड़ाने
मैं मैं करता जीव पुरातन
जीते जी क्यूँ हारा।
सबका सिरजन हारा प्रभु तू
सबका सिरजन हारा।।

भूला तन और भूला मन भी
अकल अबोली साधी
चेतन चित प्रभु लागी तो फिर
जीव लखा भिनुसारा।
सबका सिरजन हारा प्रभु
तू सबका सिरजन हारा।।

लगन लगी जब जीव पिछाणा
कर अरदास पुकारा जी
अनहद नाद बजी तूरा की
अन्तरि फफक उजारा।
सबका सिरजन हारा प्रभु तू
सबका सिरजन हारा।।

माया छूटै बन्धन टूटै
टूटै जम की फाँसी
तीन छलाँगा दूर तुरीया
पूरण ब्रह्म प्रसारा।
सबका सिरजन हारा प्रभु तू
सबका सिरजन हारा।।




जीवनं सर्व भूतेषु।   तेजश्चास्मि विभावसौ    गीता९/७
[18/01, 18:39] रामनारायण सोनी: अण्ड कटाह=ब्रह्माण्ड
रामचरित चरित मानस बाल काण्ड
तूरा= तुरीय
चार चतुर=अन्तःकरण चतुष्टय
नटी माया के लिये प्रयुक्त--रामचरित मानस
उन्नीस मुख = १० इन्दियाँ, ५ प्राण, ४ अन्तःकरण
पाँच अगन= ५ अग्नियाँ (शरीर में स्थित)
अहं वैश्वानरो भूत्वा...पचति = मैं अग्नि में हो कर अन्न को पचाता हूँ। गीता।
ज्योतिषां अपि तज्ज्योति इंद्रियों में उनकी सामर्थ का कारण (कठोपनिषद्)
प्रपञ्च= पंचमहाभूत
[18/01, 19:03] रामनारायण सोनी: जागे सोते सपना देखे
नींद लगी अति भारी
बिना सपन की नीद सिरानी
आणंद का झनकारा
सबका सिरजन हारा प्रभु तू
सबका सिरजन हारा।।
जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति, समाधि
क्रमिक अवस्था(माण्डूक्योपनिषद्)

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