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Wednesday, 24 January 2018

🔥 क्षितिज दिग्बन्ध 🌦

 फ्यूजन   
  क्षितिज दिग्बन्ध

दोनों क्षितिजों पर अलग अलग
एक सूरज था, एक चाँद निलय
एक ही दिन, और एक समय,
इक सृजन हास, इक महा प्रलय।।

हाथों मेँ हवि के वे पात्र लिये
एक आँगन, एक एक भाव जिये।
    हा! क्यूँ सिंदूरी अकथ बन्ध
    वहँ लसती शीतल मलय गंध।।

रचते वे अपने अपने ही  ध्रुव,
फैला द्वन्द्वों का वह कलरव
लखता उत्तर में अजब बन्ध
एक ले कर मधु सी मलय गन्ध।।

पर एक तरफ है चिर पतझर
दूजे पर झरता मधु बसन्त।
    हा! क्यूँ सिंदूरी अकथ बन्ध
    वहँ लसती शीतल मलय गंध।।
अपना अपना वे भाग्य लिये
कैसे जग में किस भाँति जिये
था नियति नटी का इन्द्रजाल
इस तरफ घिरे हैं विषम व्याल।।

प्राची में रवि का तमस हरण
उस तरफ उठी स्वर्णाभ किरण।
    हा! क्यूँ सिंदूरी अकथ बन्ध
    वहँ लसती शीतल मलय गंध।।

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन