जीवन-मृत्यु-अमर्त्य
साँस आती है, साँस जाती है
जीवन भर फिर फिर दोहराती है
एक दिन एक तरफा हो जाती है
बस एक ही बार नहीं दोहराती है
साँसों के पार भी जीवन था
साँसों के पार भी जीवन होगा
जीवन के उन दोनों छोर परे
जीवन था फिर जीवन होगा
"मैं" था, पर था अनभिव्यक्त
''मैं" हो जाऊँगा फिर अनभिव्यक्त
अक्षुण्ण, अभेद्य, अछेद्य,
अक्लेद्य, अदाह्य, अमृत हूँ "मैं"
रामनारायण सोनी

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