भाव निर्झर, रूह की राहत, प्रेम और समर्पण
लिखना शेष अभी है मुझको लोचन में बहते अश्कों को। करुणा के कातर क्रन्दन और विगलित तन बुझती पलकों को।।
बहुत लिखा है सोनजुही से भीनी महकी हुई बगिया को। कीचड़ भरी तंग बस्ती पर लिखना शेष अभी है मुझको।।
No comments:
Post a Comment