मैं जब भी गीत लिखता हूँ
कलम पर कोई बैठ जाता है
कभी मैं अपने हाथ को
तो कभी कलम को देखता हूँ
बन करके वो सियाही मेरे
पन्नों पे उतर आता है
बन गया है गीत कोई या बनी गज़ल
लिखता वही हूँ केवल जो
तू आखों से बोल जाता है
कलम पर कोई बैठ जाता है
कभी मैं अपने हाथ को
तो कभी कलम को देखता हूँ
बन करके वो सियाही मेरे
पन्नों पे उतर आता है
बन गया है गीत कोई या बनी गज़ल
लिखता वही हूँ केवल जो
तू आखों से बोल जाता है

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