तुम यादों के झुरमुट से मेरे मन आँगन आती हो।
सच मानो रीते जीवन में उल्लास जगा जाती हो।।
खुले नयन है गहन गगन में, अंतरतम के सरल सृजन हैं।
स्वर्णिम यादों की परतों में, मृदुल करों का अवगुंठन है।
बिन छुए छुअन की सिहरन है, स्वाँस- स्वाँस में चन्दन वन है।
प्रीत अरुण ले प्राची में तुम, ऊषा बन कर आती हो।।
तुम यादों के झुरमुट से मेरे मन आँगन आती हो।
सच मानो रीते जीवन में उल्लास जगा जाती हो।।
सपनों पर अपना जोर नहीं, वह उनका बहशीपन है।
ले जावें किस ओर उड़ाकर दिग दिगंत का ठौर नहीं।।
किससे पूछूं किससे जानूं मेरे प्रिय की बसर कहाँ है ।
इस बस्ती से उस नगरी तक बंजारे की डगर कहाँ है।।
तुम यादों के झुरमुट से मेरे मन आँगन आती हो।
सच मानो रीते जीवन में उल्लास जगा जाती हो।।
जब दूर क्षितीज में सांझ ढले, और शीतल मंद बयार चले।
बरगद की साखों पर पंछी, कल-कल कलरव गान करे।।
धरती पे है निविड़ निशा, तारों की चूनर ओढ़ प्रिये।
मेरे मन के उपवन मे तुम, प्रणय प्रसंग लिये आती हो ।।
तुम यादों के झुरमुट से मेरे मन आँगन आती हो।
सच मानो रीते जीवन में उल्लास जगा जाती हो ।।

No comments:
Post a Comment