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Sunday, 18 December 2016

पुरानी सी मेरी डायरी के जर्द पड़ गए पृष्ठों में

पुरानी सी मेरी डायरी के
जर्द पड़ गए पृष्ठों में
पृष्ठों में सियाही जो है
मेरी कलम की ही है, पर
हर शब्द में रूह तुम्हारी ही है
सौंधी सी महकती है सुगन्ध बन कर
उन अक्षरों में तुम्हारे तन बदन की
कैसे अजीब संगतराश हैं ये
मिल कर तुम्हारी सूरत बना देते हैं
एक अक्षर पर चढ़ी बिंदी
उतरी थीं तुम्हारे ही माथे से

और कहीं
सपनीले गुलाबी एक पृष्ठ पर
यादों की लेई से चिपके अक्षर
गूँजते रहते हैं अक्सर
रूह की आवाज बन कर
उस खास कमरे में दिल के
नहीं आता जाता जहाँ कोई और
सुनता हूँ इनको मैं जी भर भर कर
"चुपके चुपके कुछ कहते हैं
आसमान के झिलमिल तारे
भाव भरे है ऐसे ही
देखाे ये शब्द हमारे"

और इसमें कहीं
छुपाया था ताजा ताजा
गुलाबी गुलाब का वह फूल
झड़ गया था कहीं सूख कर
वक्त की डाल से टूटे लम्हे की तरह
पन्ने पर छूटे हुए निशान में
एक चेहरा झाँकता है कनखियों से
तकता है मुझे अजनबी की तरह
पूछता है, कौन हो तुम?
और मैं कह उठता हूँ
जिन्दगी की डायरी है गवाह
जानती है केवल तुमको
यहाँ कोई और नहीं,
केवल तुम ही तुम हो।।

इसमें मौजूद है फिंगर प्रिन्ट
टेसू के चटकीले रंग भरे
फेंके थे पीले, गुलाबी रंग तुमने
अकसर पृष्ठ पर से निकल कर
घुस जाते हैं जेहन में
कर जाते तर बतर तन मन
उदास होता मैं जब कभी
दौड़ता हूँ इन पृष्ठों में इधर से उधर
निकलता हूँ ताजा दम हो कर
जिन्दगी की डायरी है गवाह,
जो जानती है केवल तुमको
यहाँ कोई और नहीं,
केवल तुम ही तुम हो।।

पुरानी सी मेरी डायरी के
जर्द पड़ गए पृष्ठों में
पृष्ठों में सियाही जो है
मेरी कलम की ही है
मेरी दौलत है, सनद यही है
इसमें मैं भी नहीं हूँ
हाँ, यहाँ कोई और नहीं,
केवल तुम ही तुम हो।।

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