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Wednesday, 14 December 2016

है कोई जो मुझे मुझ से मिला दे

मैं, अकसर बेखबर सा
खुद को देखता हूँ अचरज से
क्या बताऊँ, किसको बताऊँ
मैं मुझसे ही बहुत दूर निकल आया हूँ
न मुड़ कर कभी देखा
न रुक कर कभी सोचा
न अपनी पहिचान रही बाकी
क्योंकि मैं तो स्वयं ही
मुझसे ही बहुत दूर निकल आया हूँ
है कोई जो मुझे मुझ से मिला दे?

है कोई तजबीज या सक्ष कहीं?
जो लगी जंग मेरी अस्मिता को
मुझ से छुड़ा दे
है छिपा कोई रश्मि पुँज मुझमें ही
फूँक कर अज्ञान के कोहरे को
परमज्योति का जो दर्शन करा दे
दूर बज रही है प्रणव की भेरियाँ
कानों पर लगे हैं माया के ढँकने
आकर कोई अब तो हटा दे
मैं मुझसे ही बहुत दूर निकल आया हूँ
है कोई जो मुझे मुझ से मिला दे?

मैं खड़ा था कुण्ठित सा
दुनिया के मोहक मायावी रंगमंच पर
तभी विस्तीर्ण नेपथ्य से
एक छाया सी उतरी
छुआ उसने रेशमी उँगलियों से
तब मैं जगत देख रहा था
उसने मुझे उल्टा घुमा दिया
और जाते जाते यह कह गई
यहाँ से केवल तीन छ्लाँग दूर पर
तुरीय का सत्य बोध है
वैश्वानर से तैजस, तैजस से प्राज्ञ
और प्राज्ञ से ओंकार

यह रूप की नहीं स्वरूप की यात्रा है
यात्रा है अपनी उपाधियों के विसर्जन की
यात्रा है मेरी मुझमें लौटने की
अभी नहीं होगी तो कभी नहीं होगी

यह प्रयाण नहीं आरोहण है
क्योकि मैं तो सिर्फ "मैं" हूँ....
"अहं ब्रह्मास्मि"

पहली छलाँग स्वप्न में
दूसरी सुषुप्ति में और तीसरी
तीसरी उस विराट में, परमचेतना में
छाया नेपथ्य में विलीन हो गई

शायद  मुझे तलाश थी
इसी जामवन्त की,
युगों युगों से
जन्म जन्मान्तरों से

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