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Friday, 23 December 2016

वहाँ तुम ही हो


उस ऊँचे से शिखर की ढलान से
एक लुढ़कता पत्थर कहता है
वहाँ कोई है मेरा अपना,
अल्हड़ बादल के टुकड़े सा लहराता
मचलता वह सफेद सा दुपट्टा
कह रहा है इशारे से वहाँ तुम ही हो,
फिर आहटें वे फुसपुसाती कुछ
जैसे घुँघरू एक साथ झनक उठे हों
आम के वे सूखे जर्द  पत्ते
कह रहे है जैसे, वहाँ तुम ही हो

मचलती लहराती  रेशमी पगडंडियाँ
ले जाती है रोज तुम्हें इधर से उधर
लाँघती उस विशाल राजपथ को
मटमैली सर्पिल इतराती पगडंडियाँ
मखमली नर्म हरी चादरों में लिपटी
आकाश से रेंगती, उतरती, सरकती
मेरे घर तक, हृदय तक, अंतस तक
दीखती हो तुम कभी कभी न हो कर भी
उडती उस धुल के उस पार जैसे
कह रहा है हवा का झोंका वहाँ तुम ही हो,

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन